भारत रूस से तेल लगा या नहीं? अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने लिया चौकाने वाला फैसला, जानें

होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव और वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच अमेरिका ने एक बड़ा और चौंकाने वाला फैसला लिया है। Donald Trump प्रशासन ने रूस से तेल खरीदने को लेकर दी गई छूट को एक महीने के लिए बढ़ा दिया है। इस फैसले के तहत अब 16 मई 2026 तक रूसी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की खरीदारी जारी रह सकेगी। यह कदम ऐसे समय में आया है जब कुछ दिन पहले ही अमेरिकी वित्त सचिव स्कॉट बेसेंट ने संकेत दिया था कि इस छूट को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा। अचानक आए इस बदलाव ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में हलचल पैदा कर दी है।

पिछली नीति और नई छूट की शर्तें

अमेरिका की यह नई अनुमति पिछली 30 दिन की छूट के बाद लागू की गई है, जो 11 अप्रैल को समाप्त हो चुकी थी। नई व्यवस्था के तहत कुछ शर्तों में ढील दी गई है ताकि पहले से लदे तेल टैंकर अपने लेनदेन पूरे कर सकें। हालांकि, इस छूट में ईरान, क्यूबा और उत्तर कोरिया के साथ किसी भी प्रकार के व्यापार को पूरी तरह बाहर रखा गया है। यानी इन देशों से कोई भी तेल या ऊर्जा लेनदेन इस अनुमति के दायरे में नहीं आएगा। यह कदम ऊर्जा आपूर्ति को स्थिर रखने और वैश्विक बाजार में अचानक कीमतों के उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए उठाया गया है।

अमेरिका के भीतर ही बढ़ी आलोचना और राजनीतिक बहस

इस फैसले के बाद अमेरिका के भीतर भी राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कुछ सांसदों ने इस छूट की आलोचना करते हुए कहा है कि इससे रूस और ईरान जैसी अर्थव्यवस्थाओं को अप्रत्यक्ष रूप से मजबूती मिल सकती है, खासकर तब जब दोनों देशों पर पहले से प्रतिबंध लागू हैं। अमेरिकी वित्त विभाग ने पहले दावा किया था कि इस तरह की छूट से वैश्विक बाजार में करीब 140 मिलियन बैरल तेल की आपूर्ति हुई और ऊर्जा संकट को कुछ हद तक राहत मिली। लेकिन आलोचकों का कहना है कि इससे प्रतिबंधों की प्रभावशीलता कमजोर हो सकती है।

होर्मुज संकट और वैश्विक तेल बाजार पर असर

इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा तनाव होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बना हुआ है, जहां हालात अस्थिर बने हुए हैं। इस समुद्री मार्ग से दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस का परिवहन होता है, और किसी भी तरह की रुकावट सीधे वैश्विक ऊर्जा कीमतों को प्रभावित करती है। मौजूदा तनाव के कारण पहले ही पेट्रोलियम कीमतों में उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका का यह फैसला फिलहाल बाजार को स्थिर करने की कोशिश है, लेकिन अगर होर्मुज संकट बढ़ता है तो आने वाले समय में ऊर्जा बाजार फिर बड़े झटके झेल सकता है।

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