Iran US Ceasefire: ईरान और अमेरिका के बीच घोषित दो हफ्तों के सीजफायर ने जहां वैश्विक स्तर पर राहत की उम्मीद जगाई है, वहीं इजरायल की प्रतिक्रिया ने इस समझौते पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा घोषित इस अस्थायी युद्धविराम में इजरायल को भी शामिल बताया गया है, लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक वह इसकी शर्तों से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। इजरायल का मानना है कि यह समझौता उसकी सुरक्षा चिंताओं को पूरी तरह संबोधित नहीं करता। हालांकि, व्हाइट हाउस के अधिकारियों का कहना है कि इजरायल ने बातचीत के बाद ही इस सीजफायर में शामिल होने की सहमति दी है। यही विरोधाभास इस पूरे मामले को और पेचीदा बना रहा है।
होर्मुज स्ट्रेट और डेडलाइन का दबाव बना टर्निंग पॉइंट
इस पूरे घटनाक्रम में होर्मुज स्ट्रेट एक बार फिर केंद्र में आ गया है। अमेरिका ने ईरान को स्पष्ट समयसीमा दी थी कि वह इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को खोले, नहीं तो उसके खिलाफ हमले और तेज किए जाएंगे। डेडलाइन खत्म होने से ठीक पहले सीजफायर का ऐलान कर दिया गया, जिससे यह संकेत मिलता है कि दोनों पक्ष किसी बड़े टकराव से बचना चाहते थे। इस समझौते के तहत इजरायल ने भी अपनी बमबारी अस्थायी रूप से रोकने पर सहमति जताई है। कहा जा रहा है कि जब तक कूटनीतिक बातचीत जारी रहेगी, तब तक इजरायल अपने सैन्य अभियान को सीमित रखेगा। हालांकि, यह पूरी तरह स्थायी शांति की गारंटी नहीं देता।
इजरायली मीडिया का दावा—पहले से तय थी रणनीति
इजरायली मीडिया में सामने आई रिपोर्ट्स ने इस पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया है। एक वरिष्ठ राजनयिक सूत्र के हवाले से दावा किया गया है कि यह सीजफायर अचानक नहीं, बल्कि पहले से अमेरिका और इजरायल के बीच तय रणनीति का हिस्सा था। इस दावे के मुताबिक, ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट खोलने पर सहमति तो दी, लेकिन बदले में उसे अपनी बड़ी मांगों पर कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला। इनमें स्थायी शांति की गारंटी, आर्थिक प्रतिबंधों में राहत और युद्ध से हुए नुकसान का मुआवजा शामिल था। यही कारण है कि इजरायल को लगता है कि यह डील अधूरी है और इससे लंबे समय में खतरे खत्म नहीं होंगे।
आगे की बातचीत में अमेरिका का सख्त रुख
आने वाले दो हफ्ते इस पूरे मामले में बेहद अहम माने जा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ने इजरायल को भरोसा दिलाया है कि आगे की वार्ता में अमेरिका ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाएगा। इसमें परमाणु कार्यक्रम पर रोक, यूरेनियम संवर्धन को सीमित करना और बैलिस्टिक मिसाइल खतरे को खत्म करने जैसे मुद्दे शामिल होंगे। अगर इन बिंदुओं पर सहमति नहीं बनती है, तो यह सीजफायर टूट भी सकता है। ऐसे में मिडिल ईस्ट में शांति की उम्मीद अभी भी अनिश्चित बनी हुई है। फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या यह अस्थायी विराम स्थायी समाधान में बदल पाएगा या फिर यह सिर्फ बड़े संघर्ष से पहले की खामोशी है।
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