28 फरवरी से शुरू हुई इस भीषण जंग ने एक ऐसा मोड़ ले लिया है जिसने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। ईरान के मिनाब शहर में स्थित ‘शजारेह तैयबेह गर्ल्स स्कूल’ पर हुए मिसाइल हमले को लेकर अब एक बड़ा खुलासा हुआ है। ईरान ने इस हमले को कोई मानवीय चूक नहीं, बल्कि एक ‘प्लान्ड मर्डर’ करार दिया है। ईरान का दावा है कि इस हमले में 168 मासूम बच्चों समेत कुल 175 लोगों की जान गई है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ईरान ने अब उन चेहरों को बेनकाब करने का दावा किया है, जिनके एक आदेश ने हंसते-खेलते स्कूल को श्मशान बना दिया। ईरान ने भारत समेत कई देशों में स्थित अपने दूतावासों के जरिए अमेरिकी नौसेना के दो आला अधिकारियों की तस्वीरें साझा कर उन्हें दुनिया के सामने ‘क्रिमिनल’ के तौर पर पेश किया है।
ईरान का बड़ा प्रहार: इन दो अमेरिकी अफसरों को बताया ‘मौत का सौदागर’
ईरान ने इस नरसंहार के लिए सीधे तौर पर अमेरिकी युद्धपोत ‘USS स्प्रुअंस’ के दो शीर्ष अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया है। ईरानी दूतावासों द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, पहला नाम कमांडिंग ऑफिसर एल आर टेट का है और दूसरा नाम एग्जीक्यूटिव ऑफिसर जेफरी ई यॉर्क का है। ईरान का आरोप है कि इन्हीं दोनों अफसरों ने गर्ल्स स्कूल को निशाना बनाने के लिए एक के बाद एक तीन घातक ‘टॉमहॉक’ मिसाइलें दागने की अंतिम मंजूरी दी थी। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर ईरान इन इंडिया ने इन अफसरों की तस्वीरें पोस्ट करते हुए लिखा कि दुनिया इन दो अपराधियों को याद रखे, जिन्होंने मासूमों के खून से अपने हाथ रंगे हैं। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने जेनेवा में एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस हमले को चरणबद्ध और सुनियोजित ऑपरेशन बताते हुए न्याय की मांग की है।
अमेरिकी फौज की दलील: ‘टारगेट लॉक’ में हुई बड़ी इंटेलिजेंस चूक?
एक तरफ जहां ईरान इसे जानबूझकर किया गया हमला बता रहा है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी सैन्य गलियारों से ‘सफाई’ और ‘संभावित गलती’ के सुर सुनाई दे रहे हैं। अमेरिकी मिलिट्री रिव्यू की शुरुआती रिपोर्ट में यह संकेत दिए गए हैं कि यह हमला पुराने इंटेलिजेंस इनपुट के आधार पर हुआ हो सकता है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि टॉमहॉक मिसाइलों का वास्तविक निशाना स्कूल के पास स्थित एक ‘मिलिट्री फैसिलिटी’ थी, जो कभी उसी जमीन का हिस्सा हुआ करती थी। पुरानी मैपिंग और इंटेलिजेंस डेटा के कारण मिसाइलें अपने सटीक लक्ष्य से भटक गईं या गलत स्थान पर गिर गईं। वॉशिंगटन ने स्पष्ट किया है कि अमेरिकी फौज बेहद अनुशासित है और वह कभी भी जानबूझकर नागरिक ठिकानों या बच्चों के स्कूलों को निशाना नहीं बनाती, क्योंकि उनका संविधान इसकी सख्त मनाही करता है।
सवालों के घेरे में ‘अनुशासन’: क्या वाकई यह सिर्फ एक तकनीकी गलती थी?
इस खूनी संघर्ष के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि क्या आधुनिक तकनीक के इस दौर में इतनी बड़ी चूक संभव है? ईरान ने दक्षिण अफ्रीका और नाइजीरिया जैसे देशों के माध्यम से वैश्विक समुदाय से पूछा है कि क्या अमेरिकी अफसरों के अपने बच्चे नहीं हैं, जो वे दूसरे देश के बच्चों की निर्मम हत्या को सही ठहरा रहे हैं। दूसरी ओर, अमेरिका के भीतर भी इस बात की जांच शुरू हो गई है कि मिसाइल दागने से पहले इंटेलिजेंस इनपुट को क्रॉस-चेक क्यों नहीं किया गया। क्या यह वाकई एक तकनीकी खामी थी या फिर युद्ध के उन्माद में लिया गया एक क्रूर फैसला? फिलहाल जांच जारी है, लेकिन मिनाब के स्कूल की वो वीरान इमारत और मारे गए बच्चों के परिवार आज भी उन 175 मौतों का हिसाब मांग रहे हैं।








