Tuesday, January 13, 2026

खामेनेई की तस्वीर जली, उसी आग से सुलगी सिगरेट… क्या ईरान में महिलाओं ने तानाशाही के डर को जला डाला?

ईरान में इन दिनों जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे सिर्फ विरोध नहीं बल्कि दशकों से थोपे गए डर को खुली चुनौती हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और फोटो में ईरानी महिलाएं देश के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की तस्वीरों में आग लगाती दिख रही हैं और उसी जलती तस्वीर से सिगरेट सुलगाकर अपना गुस्सा जाहिर कर रही हैं। ईरान जैसे देश में, जहां महिलाओं के पहनावे, व्यवहार और सार्वजनिक जीवन पर सख्त धार्मिक नियंत्रण रहा है, वहां यह दृश्य किसी राजनीतिक बयान से कहीं ज्यादा ताकतवर माना जा रहा है। यह विरोध सिर्फ एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था के खिलाफ है जिसने सालों से महिलाओं की आवाज दबाने की कोशिश की। सड़कों पर खड़ी महिलाएं कैमरे के सामने निडर होकर खामेनेई मुर्दाबाद के नारे लगाती दिख रही हैं, जो यह बताता है कि अब डर की दीवार में गहरी दरार पड़ चुकी है। यह विरोध अचानक नहीं उपजा, बल्कि वर्षों की पीड़ा, अपमान और दबे गुस्से का नतीजा है, जो अब खुलकर सामने आ रहा है और पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है।

महंगाई से विद्रोह तक: कैसे आर्थिक दर्द बना सत्ता विरोधी आंदोलन

ईरान में मौजूदा विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत भले ही महंगाई, बेरोजगारी और बढ़ती कीमतों के खिलाफ हुई हो, लेकिन हालात तेजी से बदल गए। आम लोग सड़कों पर सिर्फ रोटी और रोजगार की मांग लेकर नहीं उतरे, बल्कि अब वे सीधे शासन व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। ईरान की अर्थव्यवस्था लंबे समय से प्रतिबंधों, भ्रष्टाचार और गलत नीतियों से जूझ रही है। पेट्रोल, खाने-पीने की चीजें और दवाइयों तक की कीमतें आम नागरिक की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं। ऐसे में जब सरकार ने सख्ती और दमन के जरिए आवाज दबाने की कोशिश की, तो गुस्सा और भड़क उठा। महिलाओं की अगुवाई में हो रहे इन प्रदर्शनों ने आंदोलन को नई दिशा दी। खामेनेई की तस्वीर जलाना सिर्फ प्रतीक नहीं, बल्कि यह संदेश है कि अब लोग सुधार नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था में बदलाव चाहते हैं। प्रदर्शनकारी यह साफ कर रहे हैं कि वे इस्लामिक रिपब्लिक के मौजूदा स्वरूप को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं और सत्ता के केंद्र पर सीधे सवाल उठा रहे हैं।

‘खामेनेई मुर्दाबाद’ से ‘पहलवी लौटेंगे’ तक: नारों में बदलती सोच

28 दिसंबर 2025 के बाद से तेहरान समेत कई बड़े शहरों में जो नारे गूंज रहे हैं, वे ईरान की राजनीति में बड़ा संकेत माने जा रहे हैं। सड़कों पर युवा, बुजुर्ग और महिलाएं एक साथ “खामेनेई मुर्दाबाद” और “पहलवी वापस आएंगे” जैसे नारे लगाते दिख रहे हैं। यह वही ईरान है, जहां 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद शाह का नाम लेना भी लंबे समय तक अपराध जैसा माना जाता था। अब प्रदर्शनकारियों का एक वर्ग खुले तौर पर ईरान के आखिरी शाह के बेटे रजा पहलवी की वापसी की बात कर रहा है। इससे यह साफ होता है कि आंदोलन सिर्फ गुस्से तक सीमित नहीं, बल्कि लोग वैकल्पिक शासन मॉडल पर भी सोचने लगे हैं। महिलाओं द्वारा खामेनेई की तस्वीरों को जलाकर सिगरेट सुलगाना इसी मानसिक बदलाव का हिस्सा है। यह सीधे-सीधे सर्वोच्च नेता की धार्मिक और राजनीतिक सत्ता को नकारने का प्रतीक बन गया है। इन नारों और प्रतीकों ने ईरान के भीतर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या देश एक बड़े बदलाव की दहलीज पर खड़ा है।

महसा अमीनी से आज तक: विरोध की आग क्यों बार-बार भड़क उठती है

ईरान में महिलाओं का यह विरोध नया नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें साल 2022 के उस आंदोलन में भी मिलती हैं, जब 22 साल की महसा अमीनी की पुलिस हिरासत में मौत के बाद देश भर में उबाल आ गया था। महसा को कथित तौर पर अनुचित पहनावे के आरोप में मोरैलिटी पुलिस ने गिरफ्तार किया था, और उसकी मौत ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया था। उस समय भी महिलाओं ने हिजाब जलाकर, बाल काटकर और सड़कों पर उतरकर विरोध दर्ज कराया था। मौजूदा आंदोलन उसी अधूरे संघर्ष की अगली कड़ी माना जा रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार गुस्सा और ज्यादा तीखा है और डर लगभग गायब होता दिख रहा है। खामेनेई की तस्वीरों को जलाना और उनसे सिगरेट सुलगाना सत्ता के लिए सीधी चुनौती है, जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। इन तस्वीरों ने यह साफ कर दिया है कि ईरान की महिलाएं अब सिर्फ अधिकार नहीं, बल्कि सम्मान और आजादी के साथ जीने का हक मांग रही हैं। यह आंदोलन चाहे जिस नतीजे पर पहुंचे, लेकिन इतना तय है कि ईरान की सड़कों पर जली यह आग लंबे समय तक सत्ता के लिए एक डरावना सवाल बनी रहेगी।

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