उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में एक ऐसा गांव है, जहां की सबसे बड़ी समस्या सड़क, बिजली या पानी नहीं, बल्कि उसका नाम है। पंदह ब्लॉक की ग्राम पंचायत खड़सरा का पुरवा “रूपवार तवायफ” अपने नाम की वजह से वर्षों से सामाजिक तिरस्कार और मानसिक पीड़ा झेल रहा है। यहां रहने वाले करीब 800 मतदाता रोजमर्रा की जिंदगी में उस नाम का बोझ उठाते हैं, जिसे सुनते ही लोग अजीब नजरों से देखने लगते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब भी कहीं पहचान बताने की बारी आती है, तो नाम सुनते ही सामने वाला व्यक्ति हंसने लगता है या शक की नजर से देखता है। इस वजह से गांव के लोग अपने ही गांव का नाम लेने से कतराते हैं। दशकों से ग्रामीण इस नाम को बदलने की मांग कर रहे हैं, लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिला है। उनके लिए यह सिर्फ नाम नहीं, बल्कि सम्मान और पहचान का सवाल बन चुका है।
अंग्रेजी शासन से जुड़ा इतिहास, जो बन गया स्थायी कलंक
ग्रामीणों और बुजुर्गों के अनुसार, इस गांव का नाम अंग्रेजी शासनकाल की देन है। बताया जाता है कि अंग्रेजों के समय इस इलाके को अय्याशी और मनोरंजन का केंद्र बनाया गया था। उस दौर में करीब 400 तवायफों को लगभग 88 एकड़ जमीन देकर यहां बसाया गया था। शाम होते ही अंग्रेज अफसर यहां पहुंचते थे और नृत्य-संगीत का आयोजन होता था। अंग्रेज चले गए, समय बदला, समाज बदला, लेकिन गांव का नाम और उससे जुड़ा कलंक यहीं का यहीं रह गया। कुछ ग्रामीण इस नाम को सिकंदर लोदी के शासनकाल से भी जोड़ते हैं। उनका कहना है कि उस समय सिकंदरपुर क्षेत्र एक बड़ी छावनी था, जहां दरबारी सभाएं, शायरी और नृत्य-संगीत के आयोजन होते थे। धीरे-धीरे यह इलाका उसी पहचान से जाना जाने लगा। करीब 142 बीघा में फैला यह पुरवा आज भी सरकारी रिकॉर्ड में उसी नाम से दर्ज है, जो ग्रामीणों के लिए सबसे बड़ा अभिशाप बन चुका है।
महिलाओं और युवाओं को सबसे ज्यादा झेलनी पड़ती है शर्मिंदगी
गांव के नाम की सबसे ज्यादा मार महिलाओं और युवाओं पर पड़ती है। ग्रामीण बताते हैं कि जब लड़कियां पढ़ाई या नौकरी के लिए बाहर जाती हैं और उनके पहचान पत्र में गांव का नाम लिखा होता है, तो लोग गलत नजरों से देखने लगते हैं। कई बार किराए पर कमरा लेने में भी परेशानी होती है। शादी-ब्याह के समय तो यह नाम और भी बड़ी समस्या बन जाता है। रिश्ता तय करते समय गांव का नाम बताना सबसे कठिन क्षण होता है। युवा पीढ़ी भी इस पहचान से बचने के लिए अक्सर अपने गांव का नाम छिपा लेती है और ग्राम पंचायत का नाम बताकर काम चलाती है। बुजुर्ग पंचदेव यादव कहते हैं कि वोटर आईडी, आधार कार्ड और अन्य सरकारी दस्तावेजों में यही नाम दर्ज है, जिसे देखकर हर बार अपमान महसूस होता है। उनका सवाल है कि जब बड़े शहरों और जिलों के नाम बदले जा सकते हैं, तो उनके छोटे से गांव की पीड़ा क्यों नहीं समझी जा रही।
‘देवपुर’ नाम की मांग और अब भी जिंदा उम्मीद
गांव के पूर्व प्रधान प्रतिनिधि राजदेव चौधरी बताते हैं कि वर्ष 2023 से गांव का नाम बदलवाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री, राज्यपाल और राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव तक को पत्र भेजे गए, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। प्रधान प्रतिनिधि पीयूष गुप्ता का कहना है कि तहसील और जिला स्तर पर कई बार आवेदन दिए गए, मगर हर बार सिर्फ आश्वासन मिला। ग्रामीणों ने गांव का नया नाम “देवपुर” रखने का प्रस्ताव दिया है, ताकि वे सम्मान के साथ अपनी पहचान बता सकें। उनका कहना है कि वे अपने इतिहास से भाग नहीं रहे, लेकिन एक ऐसे नाम के साथ जीना नहीं चाहते जो उन्हें हर कदम पर शर्मिंदगी का एहसास कराए। आज भी गांव के लोग उम्मीद लगाए बैठे हैं कि एक दिन उनका गांव नाम के इस कलंक से मुक्त होगा और वे गर्व से अपनी पहचान बता सकेंगे।
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