बस्ती जिले से लापता हुए दरोगा अजय गौड़ की मौत अब सिर्फ एक सामान्य घटना नहीं रह गई है, बल्कि यह मामला प्रशासन और पुलिस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। शव मिलने के बाद मृतक दरोगा के भाई और झांसी के एडीएम अरुण कुमार गौड़ खुद धरने पर बैठ गए हैं। एक जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी का इस तरह सड़क पर उतरना इस बात का संकेत है कि मामला कितना गंभीर है। एडीएम अरुण कुमार गौड़ ने सीधे तौर पर बस्ती के एसपी और डीआईजी पर आरोप लगाए हैं कि उनके भाई के लापता होने के बाद खोजबीन में जानबूझकर ढिलाई बरती गई। उनका कहना है कि यदि समय रहते गंभीरता दिखाई जाती, तो शायद अजय गौड़ की जान बच सकती थी। धरने के दौरान एडीएम ने यह भी कहा कि शव मिलने के बाद भी जिले के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचे, जो बेहद असंवेदनशील रवैया दर्शाता है। इस धरने के कारण पूरे जिले में प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है और आम लोग भी यह सवाल पूछने लगे हैं कि आखिर एक दरोगा के साथ ऐसा कैसे हो सकता है।
खोजबीन पर उठे सवाल, आत्महत्या नहीं हत्या का दावा
एडीएम अरुण कुमार गौड़ ने साफ शब्दों में कहा है कि उनके भाई ने आत्महत्या नहीं की है, बल्कि उनकी हत्या हुई है। उन्होंने आरोप लगाया कि पूरे मामले को शुरू से ही हल्के में लिया गया। लापता होने के बाद एफआईआर दर्ज नहीं की गई और न ही बड़े स्तर पर सर्च ऑपरेशन चलाया गया। एडीएम का कहना है कि एक कर्तव्यनिष्ठ और अनुशासित पुलिस अधिकारी इस तरह बिना किसी वजह के आत्महत्या नहीं कर सकता। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब शव बरामद हुआ, तब भी पुलिस अधिकारियों का रवैया बेहद ठंडा रहा। मृतक को देखने तक कोई वरिष्ठ अधिकारी नहीं पहुंचा, जिससे परिजनों का आक्रोश और बढ़ गया। एडीएम ने प्रशासन से मांग की है कि इस मामले में तत्काल हत्या का मुकदमा दर्ज किया जाए और निष्पक्ष जांच किसी बाहरी एजेंसी से कराई जाए। उनका कहना है कि अगर निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो सच्चाई कभी सामने नहीं आएगी और एक ईमानदार अधिकारी की मौत फाइलों में दबकर रह जाएगी।
लापता होने से शव मिलने तक उलझी कड़ियां
दरोगा अजय गौड़ परशुरामपुर थाने में तैनात थे और 5 फरवरी को अचानक रहस्यमय ढंग से लापता हो गए थे। काफी तलाश के बाद रविवार को उनका शव अयोध्या कोतवाली क्षेत्र में सरयू नदी के किनारे बरामद हुआ। इससे पहले उनकी कार बस्ती जिले में अमहट घाट के पास कुआनो नदी के किनारे खड़ी मिली थी। कार के अंदर से कुछ निजी सामान भी बरामद हुआ, लेकिन इससे कोई ठोस सुराग नहीं मिल सका। जांच के दौरान पुलिस को बस्ती मुख्यालय के कुछ सीसीटीवी फुटेज मिले हैं, जिनमें दरोगा की मौजूदगी दिखाई दे रही है। यही से मामला और उलझ जाता है। सवाल यह है कि अगर दरोगा सुरक्षित रूप से बस्ती मुख्यालय तक पहुंचे थे, तो उनकी कार कुआनो नदी के पास कैसे मिली और उनका शव अयोध्या की सरयू नदी तक कैसे पहुंचा। क्या उन्हें जबरन वहां ले जाया गया या वे खुद किसी दबाव में वहां तक गए, यह अब तक साफ नहीं हो पाया है। परिजनों का कहना है कि लापता होने से लेकर शव मिलने तक की घटनाएं आपस में मेल नहीं खा रही हैं, जो किसी बड़ी साजिश की ओर इशारा करती हैं।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर टिकी जांच, पुलिस के लिए बड़ी चुनौती
इस पूरे मामले में अब सबकी नजर पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर टिकी हुई है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि मौत डूबने से हुई या इसके पीछे कोई और कारण है। एसपी यशवीर सिंह ने बताया कि शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है और सीसीटीवी फुटेज व सर्विलांस की मदद से हर कड़ी को जोड़ा जा रहा है। उन्होंने भरोसा दिलाया है कि तकनीकी साक्ष्यों और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर जल्द ही सच्चाई सामने लाई जाएगी। वहीं, मृतक के परिजन इस बात से संतुष्ट नहीं दिख रहे हैं और उन्हें डर है कि कहीं यह मामला भी लंबी जांच में उलझकर ठंडे बस्ते में न चला जाए। पुलिस महकमे के लिए भी यह एक बड़ी चुनौती बन गया है, क्योंकि सवाल सिर्फ एक दरोगा की मौत का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता का है। अगर इस मामले में पारदर्शी और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई, तो यह पुलिस और प्रशासन दोनों के लिए एक गहरा दाग बन सकता है।







