‘ऐसे अपराधों में मौत की सजा का…’राम मंदिर चढ़ावा चोरी पर क्या बोला इलाहाबाद हाई कोर्ट?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी से जुड़े मामले पर सुनवाई के दौरान ऐसी टिप्पणी की, जिसने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। अदालत ने कहा कि धार्मिक आस्था से जुड़े स्थानों पर इस तरह की घटनाएं केवल आर्थिक अपराध नहीं हैं, बल्कि समाज के नैतिक मूल्यों पर भी गंभीर सवाल खड़े करती हैं। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने कहा कि यदि ऐसे मामलों से भी समाज विचलित नहीं होता, तो यह चिंता का विषय है। उन्होंने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार धीरे-धीरे सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा बनता जा रहा है, जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है। अदालत की यह टिप्पणी एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान दर्ज की गई, जिसमें भ्रष्टाचार और प्रशासनिक जवाबदेही पर भी चर्चा हुई।

भ्रष्टाचार पर सख्त कानून की जरूरत बताई

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति ने भ्रष्टाचार के खिलाफ और कठोर कानून बनाए जाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि सरकार को भ्रष्टाचार निरोधक कानूनों को और प्रभावी बनाने पर विचार करना चाहिए। अदालत ने यह राय भी व्यक्त की कि गंभीर भ्रष्टाचार के मामलों में बेहद कड़ी सजा का प्रावधान होना चाहिए। न्यायाधीश ने अपनी टिप्पणी में कहा कि जब सार्वजनिक व्यवस्था और लोगों के विश्वास से जुड़े मामलों में भ्रष्टाचार सामने आता है, तो उसका असर पूरे समाज पर पड़ता है। उन्होंने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार के प्रति लोगों का रवैया बदलना जरूरी है, क्योंकि कई बार इसे सामान्य मान लिया जाता है और केवल पकड़े जाने पर ही गलत माना जाता है। अदालत की यह टिप्पणी न्यायिक राय है, कोई कानूनी आदेश नहीं।

‘बुलडोजर कार्रवाई’ पर भी उठाए सवाल

इस सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने उत्तर प्रदेश में बुलडोजर कार्रवाई को लेकर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि किसी घटना के तुरंत बाद भवन गिराने जैसी कार्रवाई कई बार कानून की प्रक्रिया से अलग बहस खड़ी कर देती है। उनके अनुसार, यदि कोई अवैध निर्माण लंबे समय तक बना रहता है, तो उसकी जिम्मेदारी केवल मकान मालिक की नहीं बल्कि उन अधिकारियों की भी होती है, जिन्होंने समय रहते कार्रवाई नहीं की। अदालत ने कहा कि अवैध निर्माण को रोकना प्रशासन का दायित्व है और यदि संबंधित अधिकारी समय पर अपनी जिम्मेदारी निभाएं तो बाद में कठोर कदम उठाने की नौबत कम आएगी। न्यायालय ने प्रशासनिक जवाबदेही को मजबूत करने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

टिप्पणी बनी चर्चा का विषय, आदेश नहीं

हाईकोर्ट की इन टिप्पणियों के बाद कानूनी और राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि अदालत ने किसी कानून में तत्काल बदलाव का आदेश नहीं दिया है। भ्रष्टाचार के मामलों में मृत्युदंड जैसे प्रावधान पर विचार करने संबंधी बात न्यायमूर्ति की टिप्पणी का हिस्सा है, न कि कोई बाध्यकारी निर्देश। कानून में किसी भी प्रकार का संशोधन करने का अधिकार संसद के पास होता है। फिलहाल यह मामला अदालत की टिप्पणियों के कारण चर्चा में है और विभिन्न पक्ष इस पर अपनी-अपनी राय रख रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई के साथ-साथ पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने पर भी समान रूप से ध्यान देना जरूरी है।

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