संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की सिविल सेवा परीक्षा देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षाओं में से एक मानी जाती है। हर साल लाखों उम्मीदवार इस परीक्षा में शामिल होते हैं, लेकिन बहुत कम लोग ही इसमें सफलता हासिल कर पाते हैं। ऐसे में जब कोई उम्मीदवार इस परीक्षा में सफलता का दावा करता है तो वह खबर तेजी से चर्चा में आ जाती है। हाल ही में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से भी एक ऐसी ही कहानी सामने आई थी, जिसने लोगों का ध्यान खींच लिया।
बुलंदशहर की रहने वाली शिखा गौतम ने दावा किया कि उन्होंने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा 2025 में 113वीं रैंक हासिल की है और उनका चयन भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के लिए हुआ है। यह खबर सामने आते ही स्थानीय स्तर पर उनकी सफलता की खूब चर्चा होने लगी। मीडिया रिपोर्ट्स में उन्हें एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की बेटी बताकर उनकी संघर्ष भरी कहानी दिखाई जाने लगी। गांव और आसपास के इलाकों में उनका स्वागत किया गया, मालाएं पहनाकर सम्मानित किया गया और लोगों ने उन्हें एक प्रेरणा के रूप में देखना शुरू कर दिया।
दिल्ली की उम्मीदवार ने उठाया सवाल
हालांकि यह कहानी ज्यादा समय तक सच नहीं रह सकी। कुछ ही दिनों बाद दिल्ली की एक अन्य उम्मीदवार ने दावा किया कि यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा 2025 में 113वीं रैंक वास्तव में उनकी है। उन्होंने इस मामले में आयोग को ईमेल भेजकर स्पष्टीकरण मांगा।
दिल्ली की उम्मीदवार के इस कदम के बाद मामला तेजी से चर्चा में आ गया। इसके बाद यूपीएससी ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लिया और बुलंदशहर प्रशासन को जांच के निर्देश दिए। आयोग ने जिलाधिकारी से कहा कि मामले की सच्चाई सामने लाई जाए और यह पता लगाया जाए कि आखिर शिखा गौतम का दावा सही है या नहीं।
जैसे ही यह खबर सामने आई, सोशल मीडिया पर भी इस मामले को लेकर बहस शुरू हो गई। लोग सवाल उठाने लगे कि अगर किसी ने झूठा दावा किया है तो इसकी सच्चाई जल्द सामने आनी चाहिए।
प्रशासनिक जांच में खुली सच्चाई
यूपीएससी के निर्देश के बाद बुलंदशहर प्रशासन ने मामले की जांच शुरू कर दी। जिलाधिकारी ने जांच की जिम्मेदारी प्रशासनिक अधिकारियों को दी। इसके तहत सदर तहसीलदार मनोज रावत को शिखा गौतम के घर भेजा गया और उनसे संबंधित दस्तावेजों की जांच की गई।
जांच के दौरान प्रशासन ने परिवार से यूपीएससी परीक्षा से जुड़े प्रमाण पत्र और दस्तावेज मांगे, लेकिन परिवार सही प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका। बाद में परिवार ने अपनी गलती स्वीकार कर ली और यह माना कि दिल्ली की उम्मीदवार का चयन सही है।
जांच में यह भी सामने आया कि बुलंदशहर की शिखा गौतम ने यूपीएससी की मुख्य परीक्षा यानी मेंस भी पास नहीं की थी। ऐसे में उनका इंटरव्यू के लिए चयन होना भी संभव नहीं था। इसके अलावा उनके दस्तावेजों में नाम शिखा गौतम की जगह शिखा रानी पाया गया। इन तथ्यों के सामने आने के बाद यह साफ हो गया कि उनका आईएएस बनने का दावा पूरी तरह गलत था।
बिहार में भी सामने आ चुका है ऐसा मामला
यह पहली बार नहीं है जब यूपीएससी परीक्षा को लेकर झूठा दावा सामने आया हो। इससे पहले बिहार में भी इसी तरह का मामला सामने आ चुका है। बिहार के भोजपुर जिले की आकांक्षा सिंह ने दावा किया था कि उन्हें यूपीएससी परीक्षा में 301वीं रैंक मिली है।
हालांकि बाद में आयोग ने स्पष्ट किया कि 301वीं रैंक उत्तर प्रदेश के गाजीपुर की रहने वाली आकांक्षा सिंह को मिली है। जांच में यह भी पाया गया कि बिहार की आकांक्षा द्वारा दिखाए गए एडमिट कार्ड के क्यूआर कोड में रोल नंबर अलग था, जिससे उनका दावा गलत साबित हो गया।
लगातार सामने आ रहे ऐसे मामलों ने लोगों को हैरान कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यूपीएससी जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा में झूठा दावा करना न केवल गलत है बल्कि इससे असली सफल उम्मीदवारों की मेहनत और उपलब्धि भी प्रभावित होती है। ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई की जरूरत बताई जा रही है ताकि भविष्य में कोई भी इस तरह की गलत जानकारी फैलाने की कोशिश न करे।
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