अस्पताल में भर्ती होते ही क्यों खाली हो जाती है जेब? सरकारी vs प्राइवेट का चौंकाने वाला सच आया सामने

देश में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर एक हैरान करने वाली तस्वीर सामने आई है। National Sample Survey (NSS) के ताजा सर्वे में पता चला है कि अस्पताल में भर्ती होने पर लोगों को भारी खर्च उठाना पड़ रहा है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सरकारी अस्पतालों के मुकाबले निजी अस्पताल कई गुना ज्यादा पैसे वसूल रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, प्राइवेट अस्पतालों में इलाज का खर्च सरकारी अस्पतालों से करीब 10 से 11 गुना तक ज्यादा हो सकता है। यही वजह है कि एक बार अस्पताल में भर्ती होने के बाद आम आदमी की बचत तेजी से खत्म होने लगती है।

इंश्योरेंस बढ़ा, लेकिन जेब से खर्च कम नहीं हुआ

पिछले कुछ वर्षों में देश में हेल्थ इंश्योरेंस लेने वालों की संख्या जरूर बढ़ी है, लेकिन इससे लोगों की आर्थिक परेशानी कम नहीं हुई है। सर्वे के मुताबिक, पहले के मुकाबले अब गांव और शहर दोनों जगह ज्यादा लोग बीमा से जुड़े हैं। इसके बावजूद जब इलाज की जरूरत पड़ती है, तो कुल खर्च का बड़ा हिस्सा लोगों को अपनी जेब से ही देना पड़ता है। आंकड़े बताते हैं कि अस्पताल में भर्ती होने पर कुल खर्च का लगभग 90 प्रतिशत तक लोगों को खुद वहन करना पड़ रहा है। इसका मतलब यह है कि बीमा होने के बावजूद लोगों को पूरी राहत नहीं मिल पा रही।

सरकारी और निजी अस्पताल के खर्च में बड़ा अंतर

अगर खर्च की बात करें तो सरकारी और निजी अस्पतालों के बीच बड़ा फर्क साफ नजर आता है। सरकारी अस्पताल में भर्ती होने पर औसतन खर्च कुछ हजार रुपये तक सीमित रहता है, जबकि निजी अस्पतालों में यही खर्च कई गुना बढ़ जाता है। उदाहरण के तौर पर, जहां सरकारी अस्पताल में इलाज का खर्च करीब 6 से 7 हजार रुपये तक आता है, वहीं निजी अस्पताल में यही खर्च 50 से 60 हजार रुपये तक पहुंच सकता है। खास बात यह है कि इस पूरे बिल का बड़ा हिस्सा मरीज को खुद ही चुकाना पड़ता है, जिससे आर्थिक दबाव और बढ़ जाता है।

डॉक्टर फीस भी बढ़ा रही बोझ

सर्वे में यह भी सामने आया है कि निजी अस्पतालों में डॉक्टर और सर्जन की फीस भी काफी ज्यादा होती है। शहरों में यह अंतर और ज्यादा बढ़ जाता है। जहां सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर की फीस बहुत कम होती है, वहीं निजी अस्पतालों में यही फीस कई गुना ज्यादा हो जाती है। इससे कुल बिल में बड़ा इजाफा होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्वास्थ्य सेवाओं को किफायती बनाने के लिए नीतियों में सुधार की जरूरत है, ताकि आम आदमी को इलाज के लिए अपनी पूरी जमा पूंजी खर्च न करनी पड़े।

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