उत्तराखंड के नैनीताल जिले के रामनगर में एक अनोखी घटना लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। ढिकुली गांव के गरल कंठेश्वर महादेव मंदिर में हर शाम एक विशाल कछुआ पहुंचता है। यह मंदिर कॉर्बेट क्षेत्र के बफर जोन में जंगल और नदी-नालों के करीब स्थित है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, कछुआ कई वर्षों से लगभग एक ही समय पर मंदिर आता है। कुछ देर वहां रुकने के बाद वह प्रसाद खाता है और फिर वापस जंगल की ओर चला जाता है। इस घटना को देखने वाले लोग हैरान हैं कि आखिर कछुआ रोज मंदिर तक कैसे पहुंच जाता है और उसे रास्ते की जानकारी कैसे रहती है।
कोई इसे शिवभक्ति तो कोई मानता है भोजन की तलाश
मंदिर में कछुए के आने को लेकर स्थानीय लोगों की अलग-अलग धारणाएं हैं। कुछ श्रद्धालु इसे भगवान शिव के प्रति आस्था से जोड़कर देखते हैं और कछुए को शिवभक्त मानते हैं। वहीं, कुछ लोगों का मानना है कि मंदिर में मिलने वाला भोजन उसे यहां आने के लिए आकर्षित करता है। ढिकुली निवासी और वन्यजीव प्रेमी संजय छिम्वाल के अनुसार, वह इस कछुए को कई वर्षों से मंदिर आते-जाते देख रहे हैं। उनके मुताबिक, कछुआ शाम को मंदिर पहुंचता है, वहां उसे प्रसाद दिया जाता है और कुछ समय बाद वह उसी रास्ते से वापस लौट जाता है। हालांकि, कछुए के इस व्यवहार के पीछे की असली वजह अभी स्पष्ट नहीं है।
महाभारत काल से जुड़ी है मंदिर की मान्यता
गरल कंठेश्वर महादेव मंदिर अपनी धार्मिक मान्यताओं के लिए भी जाना जाता है। स्थानीय जनश्रुति के अनुसार, इस मंदिर का संबंध महाभारत काल से है। कहा जाता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने इस क्षेत्र में समय बिताया था। स्थानीय मान्यता यह भी है कि यहां शिवलिंग की स्थापना महाबली भीम ने की थी। मंदिर के आसपास का प्राकृतिक वातावरण और जंगल के बीच इसकी स्थिति इसे खास बनाती है। ऐसे में मंदिर में कछुए का नियमित रूप से पहुंचना लोगों की धार्मिक आस्था और जिज्ञासा, दोनों को बढ़ा रहा है। हालांकि, मंदिर से जुड़ी प्राचीन कथाएं स्थानीय मान्यताओं पर आधारित हैं।
कछुए के व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन क्यों जरूरी?
रामनगर के पीएनजी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. एमसी पांडे के अनुसार, कछुए का नियमित रूप से मंदिर पहुंचना अध्ययन का विषय है। इसके पीछे केवल भोजन को कारण मान लेना पर्याप्त नहीं होगा। इसके रास्ते, आसपास के जलस्रोत और भोजन की उपलब्धता की जांच से उसके व्यवहार को समझने में मदद मिल सकती है। वहीं, कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के पार्क वार्डन बिंदर पाल सिंह के मुताबिक, मानसून के दौरान कई सरीसृप अपने ठिकानों से बाहर निकलते हैं। मंदिर जंगल और जलस्रोतों के पास होने के कारण वहां कछुए का पहुंचना संभव है। फिलहाल यह जानने के लिए वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है कि कछुआ रोज मंदिर क्यों आता है। साथ ही, वन्यजीव को सुरक्षित रखना और उसे प्राकृतिक भोजन खोजने देना भी महत्वपूर्ण है।
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