हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में आधुनिकता के इस दौर में भी कई ऐसी प्राचीन परंपराएं जीवित हैं जो आज भी लोगों को रोमांच और सिहरन से भर देती हैं। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी और अमावस्या के इन दो दिनों में राज्य के सिरमौर, शिमला, मंडी, सोलन और कुल्लू के ग्रामीण अंचलों में एक अनोखा डर और रहस्य का माहौल रहता है। स्थानीय भाषा में इस खौफनाक रात को ‘डगयाली’ या ‘चुड़ैल की रात’ के नाम से जाना जाता है। जानकारों के अनुसार, बुधवार मध्यरात्रि से शुरू होने वाला यह दौर गुरुवार सुबह तक प्रभावी रहता है, जिसके चलते लोग घरों से बाहर निकलने से तौबा कर लेते हैं।
अदृश्य शक्तियों की सक्रियता का अमानवीय विश्वास
स्थानीय लोक कथाओं और मान्यताओं के मुताबिक, इन विशेष रातों में नकारात्मक ऊर्जा, भूत-प्रेत, डायन और डाकनी जैसी अदृश्य शक्तियां अपने चरम पर होती हैं। हालांकि विज्ञान इन बातों को खारिज करता है, लेकिन ग्रामीण संस्कृति में इसे अघोरा चतुर्दशी और कुशाग्रहणी अमावस्या से जोड़कर देखा जाता है। सिरमौर क्षेत्र में तो इससे जुड़ा ‘अदृश्य डगयाली नृत्य’ बेहद प्रसिद्ध है, जिसके बारे में यह माना जाता है कि आम इंसान इसे नहीं देख सकता। इस रहस्यमयी गतिविधि का अनुभव केवल कुछ विशेष तांत्रिक या देव परंपराओं से जुड़े लोग ही कर पाते हैं, जो इस परंपरा के डर को और अधिक गहरा कर देता है।
बुरी नजर और नकारात्मकता से बचने के पारंपरिक उपाय
इन दो डरावनी रातों के दौरान नकारात्मक ताकतों के प्रकोप से बचने के लिए ग्रामीण कई प्रकार के पारंपरिक और घरेलू उपाय आजमाते हैं। घरों, खेतों और पशुशालाओं की सुरक्षा के लिए स्थानीय पुरोहितों द्वारा अभिमंत्रित किए गए चावल और सरसों के दानों का छिड़काव किया जाता है। इसके अलावा, घरों के मुख्य दरवाजों और खिड़कियों पर भेखल तथा टिंबर के पौधों की विशेष टहनियां लगाई जाती हैं। लोगों का अटूट विश्वास है कि ये उपाय उनके परिवार और मवेशियों को किसी भी अज्ञात खतरे या बुरी बला से महफूज रखते हैं।
आधुनिक दौर में भी अटूट है लोक विश्वास की यह डोर
समय के साथ भले ही जीवनशैली आधुनिक हो गई हो और विज्ञान ने हर क्षेत्र में तरक्की कर ली हो, लेकिन हिमाचल के गांवों में आज भी यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। यह महज डर का विषय नहीं है, बल्कि लोक संस्कृति और सदियों पुरानी लोककथाओं का एक जीवंत दस्तावेज है जो आज भी लोगों की दिनचर्या को प्रभावित करता है। श्रद्धा और रहस्य का यह मेल हिमाचल की लोक संस्कृति को एक अलग ही पहचान देता है, जहां विज्ञान और लोक-विश्वास दोनों साथ-साथ अपनी यात्रा तय करते हैं।
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