40 केस वाला ‘जंगल का शातिर’ अचानक क्यों झुका? बीजापुर में आज पापाराव का सरेंडर बना रहस्य!

Bastar News: छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले से एक बड़ी खबर सामने आ रही है, जहां लंबे समय से सक्रिय और सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बने मोस्ट वॉन्टेड नक्सल कमांडर पापाराव आज आत्मसमर्पण करने जा रहा है। बताया जा रहा है कि वह अपने 17 नक्सली साथियों के साथ प्रशासन के सामने हथियार डालने की तैयारी में है। खास बात यह है कि पापाराव ने खुद इस बात की पुष्टि की है और वह रातभर जंगल के रास्तों से चलते हुए सरेंडर पॉइंट तक पहुंच रहा है। इस घटनाक्रम को नक्सल विरोधी अभियान के लिए एक अहम मोड़ माना जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, इस आत्मसमर्पण में मीडिया की भी भूमिका रही है, जिससे यह मामला और चर्चा में आ गया है। यदि यह सरेंडर सफल होता है, तो यह सुरक्षा बलों और सरकार के लिए बड़ी उपलब्धि साबित होगी।

कौन है पापाराव? कई नाम, लेकिन एक खतरनाक पहचान

नक्सल कमांडर पापाराव का असली नाम सुन्नम पापाराव है, लेकिन वह मंगू दादा और चंन्द्रन्ना जैसे नामों से भी जाना जाता है। वह छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले का रहने वाला है और लंबे समय से नक्सली संगठन के शीर्ष स्तर पर सक्रिय रहा है। पापाराव दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (DSZC) का सदस्य रहा है, जो नक्सलियों की सबसे प्रभावशाली इकाइयों में गिनी जाती है। इसके अलावा वह पश्चिम बस्तर डिवीजन कमेटी का प्रभारी और दक्षिण सब जोनल ब्यूरो का सदस्य भी रह चुका है। उसकी पहचान एक रणनीतिक और चालाक कमांडर के रूप में रही है, जो हर बार सुरक्षा बलों की पकड़ से बच निकलता था। बताया जाता है कि वह हमेशा AK-47 जैसे आधुनिक हथियारों से लैस रहता था और उसके साथ 30 से 40 सशस्त्र नक्सली चलते थे।

कई हमलों में शामिल, 40 से ज्यादा केस दर्ज

पापाराव का नाम छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में कई बड़े नक्सली हमलों से जुड़ा रहा है, खासकर बीजापुर और सुकमा जिलों में। वह भैरमगढ़ और वेस्ट बस्तर एरिया कमेटी से जुड़े कई हिंसक अभियानों में शामिल रहा है। सुरक्षा बलों पर हमले, एंबुश और सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाओं में उसकी भूमिका सामने आई है। उसके खिलाफ 40 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं और कई गिरफ्तारी वारंट भी जारी किए जा चुके हैं। स्थानीय भूगोल और जंगल के रास्तों की गहरी जानकारी होने के कारण वह हर बार मुठभेड़ के दौरान बच निकलने में सफल रहता था। यही वजह है कि वह लंबे समय तक सुरक्षा एजेंसियों के लिए सिरदर्द बना रहा।

नक्सल मुक्त अभियान को मिल सकती है बड़ी सफलता

केंद्र और राज्य सरकारें लंबे समय से देश को नक्सल मुक्त बनाने के मिशन पर काम कर रही हैं और इसके लिए 31 मार्च 2026 तक का लक्ष्य रखा गया है। पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा बलों ने कई बड़े नक्सली नेताओं को ढेर किया है, वहीं दूसरी ओर पुनर्वास नीति के जरिए नक्सलियों को मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। पापाराव का संभावित आत्मसमर्पण इस नीति की सफलता का बड़ा उदाहरण माना जा रहा है। यदि एक बड़ा कमांडर अपने साथियों के साथ हथियार छोड़ता है, तो इससे बाकी नक्सलियों पर भी मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ सकता है। यह कदम बस्तर क्षेत्र में शांति और विकास की दिशा में एक सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

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