LPG Crisis: मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव ने भारत की ऊर्जा सप्लाई पर सीधा असर डालना शुरू कर दिया है। खासतौर पर एलपीजी (LPG) की आपूर्ति में आई कमी अब एक बड़े संकट का रूप लेती दिख रही है। भारत अपनी गैस जरूरतों का बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट के देशों से आयात करता है, ऐसे में वहां किसी भी तरह की अस्थिरता का असर देश के उद्योग और आम जीवन पर तुरंत पड़ता है। पिछले कुछ दिनों में गैस सप्लाई बाधित होने की वजह से देश के कई राज्यों—खासतौर पर राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र—में हालात तेजी से बिगड़ते नजर आए हैं। स्थिति यह है कि जहां एक ओर घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता दी जा रही है, वहीं इंडस्ट्री सेक्टर को मिलने वाली गैस में भारी कटौती की जा रही है।
फैक्ट्रियों पर ताले, छोटे उद्योग सबसे ज्यादा प्रभावित
एलपीजी की कमी का सबसे ज्यादा असर छोटे और मध्यम उद्योगों पर पड़ा है, जो गैस पर निर्भर रहते हैं। सूरत, मुंबई और जयपुर जैसे औद्योगिक शहरों में कई फैक्ट्रियां या तो पूरी तरह बंद हो चुकी हैं या फिर सीमित क्षमता पर काम कर रही हैं। टेक्सटाइल, सिरेमिक और मेटल सेक्टर के कारोबारी इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित बताए जा रहे हैं। उद्योगपतियों का कहना है कि बिना गैस के उत्पादन संभव नहीं है और वैकल्पिक ईंधन महंगा पड़ रहा है। इससे लागत बढ़ रही है और ऑर्डर पूरे करना मुश्किल हो गया है। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि कई कंपनियों ने अस्थायी रूप से काम बंद कर दिया है, जिससे हजारों मजदूरों की रोजी-रोटी पर संकट आ गया है।
रेलवे स्टेशनों पर भीड़, घर वापसी को मजबूर मजदूर
इस संकट का सबसे मार्मिक दृश्य रेलवे स्टेशनों पर देखने को मिल रहा है। सूरत, मुंबई और जयपुर जैसे शहरों में बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर अपने घरों की ओर लौटते नजर आ रहे हैं। काम ठप होने और खर्च बढ़ने के कारण उनके पास शहर में रुकने का कोई ठोस कारण नहीं बचा है। कई मजदूरों का कहना है कि फैक्ट्री बंद होने के बाद उन्हें वेतन नहीं मिल रहा, जिससे रोजमर्रा का खर्च चलाना मुश्किल हो गया है। रेलवे स्टेशनों पर टिकट के लिए लंबी कतारें लग रही हैं और ट्रेनों में भारी भीड़ देखने को मिल रही है। यह नजारा कोविड काल की याद दिलाता है, जब बड़ी संख्या में मजदूरों ने शहर छोड़कर गांवों का रुख किया था।
सरकार की कोशिशें जारी, लेकिन चिंता बरकरार
सरकार इस संकट से निपटने के लिए लगातार कदम उठा रही है। घरेलू गैस उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए सप्लाई को प्राथमिकता दी जा रही है और वैकल्पिक ईंधन जैसे केरोसिन की उपलब्धता बढ़ाई जा रही है। साथ ही, इंडस्ट्री सेक्टर के लिए भी समाधान तलाशने की कोशिशें की जा रही हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या जल्द खत्म होने वाली नहीं है। जब तक मिडिल ईस्ट में हालात सामान्य नहीं होते, तब तक सप्लाई चेन पर दबाव बना रहेगा। आने वाले समय में इसका असर महंगाई पर भी पड़ सकता है, जिससे आम लोगों की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। फिलहाल, देश एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां ऊर्जा संकट का असर सिर्फ उद्योग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक स्तर पर भी गहरा प्रभाव डाल रहा है।
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