Tuesday, January 13, 2026

ये सिर्फ शहीद की मूर्ति नहीं है! इस चौराहे पर मां आज भी बेटे को ठंड से बचाती है

जम्मू के अर्निया कस्बे में एक ऐसा चौराहा है, जहां हर गुजरने वाला कुछ पल के लिए ठहर जाता है। वहां लगी एक शहीद जवान की प्रतिमा सिर्फ एक स्मारक नहीं है, बल्कि एक मां की दुनिया है। जब सर्दियों में जम्मू की हवा बर्फ जैसी ठंडी हो जाती है और तापमान तेजी से गिरने लगता है, तब इस चौराहे पर एक बूढ़ी मां ऊनी कंबल लेकर आती है। वह कांपते हाथों से उस प्रतिमा के कंधों पर कंबल लपेटती है, जैसे कोई मां अपने बेटे को ठंड से बचा रही हो। यह मां हैं जसवंत कौर और यह प्रतिमा है उनके शहीद बेटे कांस्टेबल गुरनाम सिंह की। दुनिया के लिए गुरनाम 2016 में शहीद हो चुके हैं, लेकिन मां के दिल में वह आज भी जिंदा हैं। उनके लिए यह पत्थर की मूर्ति नहीं, बल्कि वह बेटा है जो सरहद से लौट आया है, बस बोल नहीं पा रहा।

जब सर्दी से कांपती है मूर्ति, मां का कलेजा धड़क उठता है

साल 2021 में जब अर्निया में शहीद गुरनाम सिंह की प्रतिमा स्थापित की गई, तब पूरे इलाके ने इसे गर्व का प्रतीक माना। लेकिन जसवंत कौर के लिए यह उनके बेटे का दूसरा रूप बन गई। साल 2022 से हर सर्दी में वह बिना किसी को बताए, चुपचाप घर से कंबल उठाती हैं और प्रतिमा तक पहुंच जाती हैं। लोग देखते हैं, तस्वीरें बनती हैं, आंखें नम हो जाती हैं, लेकिन मां का चेहरा अजीब सुकून से भरा होता है। वह कहती हैं, “मेरा बेटा ठंड बर्दाश्त नहीं कर पाता था, ड्यूटी पर जाने से पहले भी मैं उसकी शॉल ठीक से लपेटती थी।” मां को लगता है कि अगर कंबल नहीं ओढ़ाया, तो बेटा ठिठुर जाएगा। यह दृश्य साबित करता है कि मां की ममता तर्क नहीं देखती, वह बस महसूस करती है।

अधूरी शादी और देश से किया पहला प्यार

जसवंत कौर जब अपने बेटे को याद करती हैं, तो उनकी आंखों में सपनों की एक अधूरी दुनिया तैर जाती है। गुरनाम सिंह की उम्र सिर्फ 26 साल थी। मां चाहती थीं कि अगली छुट्टी में बेटे की शादी तय हो जाए। घर में रिश्तों की बातें चल रही थीं, शहनाइयों की कल्पना की जा रही थी। लेकिन गुरनाम के दिल में सबसे ऊपर उसकी वर्दी थी। मां बताती हैं कि गुरनाम अक्सर कहा करता था, “मां, देश पहले है, बाकी सब बाद में।” उसका पहला इश्क कोई इंसान नहीं, बल्कि भारत माता और सीमा की मिट्टी थी। वह BSF की 173वीं बटालियन में तैनात था और ड्यूटी को पूजा की तरह निभाता था। मां को आज भी याद है कि आखिरी बार जब बेटा गया, तो उसने कहा था, “जल्दी लौटूंगा।” लेकिन वह लौटकर आया भी, तो एक कहानी बनकर।

गोलियों के सामने डटकर खड़ा रहा मां का लाल

21 अक्टूबर 2016 की रात हीरानगर सेक्टर में हालात बेहद तनावपूर्ण थे। सीमा पार से घुसपैठ की कोशिश हो रही थी। कांस्टेबल गुरनाम सिंह ने न सिर्फ आतंकियों की इस साजिश को नाकाम किया, बल्कि एक आतंकी को ढेर भी कर दिया। अगले दिन, 22 अक्टूबर को पाकिस्तान की ओर से भारी गोलीबारी शुरू हुई। गुरनाम गंभीर रूप से घायल हो गए, लेकिन उन्होंने पीछे हटने से इनकार कर दिया। आखिरकार गोलियों से छलनी होकर वह वीरगति को प्राप्त हुए। शहादत के बाद भी गुरनाम अपनी मां की जिंदगी का केंद्र बने हुए हैं। आज भी जसवंत कौर मानती हैं कि उनका बेटा उनके आंचल में सुरक्षित है। वह कहती हैं, “जब तक सांस है, मैं अपने बेटे को ठंड, धूप और अकेलेपन से बचाती रहूंगी।” उस कंबल में सिर्फ ऊन नहीं, एक मां की वह गर्माहट है, जिसे कोई दुश्मन, कोई गोली और कोई वक्त कभी खत्म नहीं कर सकता।

Read more-दिल्ली में मौसम का डेंजर अलर्ट! बारिश-बादलों ने बढ़ाई कड़ाके की ठंड, तापमान 6 डिग्री पर पहुंचा

Hot this week

spot_img

Related Articles

Popular Categories

spot_imgspot_img