जमीन फाड़कर निकला पूरा परिवार, फिर काटी गई नाभि… ओडिशा के इस रोंगटे खड़े करने वाले वीडियो का क्या है सच?

इन दिनों सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स पर एक ऐसा हैरान कर देने वाला वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसे देखकर लोग न सिर्फ दंग हैं, बल्कि अपनी आंखों पर यकीन नहीं कर पा रहे हैं। इंटरनेट पर वायरल हो रहे इस वीडियो में एक गहरे गड्ढे से कुछ लोग ठीक उसी तरह रेंगते हुए और बच्चों की तरह किलकारियां मारते हुए बाहर निकल रहे हैं, जैसे किसी नवजात शिशु का जन्म हो रहा हो। यह हैरतअंगेज मामला ओडिशा के मयूरभंज जिले का बताया जा रहा है, जहां एक पूरे परिवार ने सदियों पुरानी एक ऐसी अनोखी परंपरा को अंजाम दिया है जिसके बारे में आधुनिक समाज सोच भी नहीं सकता। इस रस्म को देखने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स भावुक भी हो रहे हैं और इसके पीछे की असली वजह को जानने के लिए बेहद उत्सुक भी नजर आ रहे हैं।

‘पुनर्जन्म’ की वो रहस्यमयी रस्म, जिसने सबको सोचने पर कर दिया मजबूर

दावा किया जा रहा है कि यह पूरा मामला संथाल समुदाय के एक परिवार से जुड़ा हुआ है। इस परिवार के सदस्यों ने किसी कारणवश अपना पैतृक धर्म छोड़ दिया था, लेकिन अब वे अपने मूल समाज और पुरानी संस्कृति में वापस लौटना चाहते थे। संथाल जनजाति की परंपराओं के अनुसार, अपनी जड़ों की तरफ लौटने के लिए व्यक्ति को पूरी तरह से नया जीवन अपनाना पड़ता है। इसी ‘घर वापसी’ या शुद्धिकरण के उद्देश्य से गांव वालों ने मिलकर जमीन में एक बड़ा गड्ढा खोदा। इसके बाद परिवार के सभी लोग उस अंधेरे गड्ढे के अंदर गए और फिर एक-एक करके नवजात बच्चे की तरह आवाजें निकालते हुए बाहर रेंगकर आए। इस बेहद अनोखी प्रक्रिया को समुदाय में ‘पुनर्जन्म’ का प्रतीक माना जाता है, जो यह दर्शाता है कि पुराना सब कुछ खत्म हो चुका है और अब एक बिल्कुल नई शुरुआत हो रही है।

नाभि काटने से लेकर घर की छत पर प्रहार तक: इस तरह पूरी हुई पवित्र प्रक्रिया

गड्ढे से बाहर आने के बाद का नजारा और भी ज्यादा चौंकाने वाला था। जैसे ही परिवार का कोई सदस्य बाहर आता, वहां मौजूद बुजुर्ग और महिलाएं मिलकर पारंपरिक तरीके से उसकी “नाभि काटने” की रस्म को अंजाम देते। ठीक वैसे ही जैसे जन्म के तुरंत बाद किसी बच्चे की गर्भनाल काटी जाती है। इसके बाद प्रतीकात्मक रूप से उस कटी हुई नाभि को मिट्टी के अंदर ही दबा दिया गया। शुद्धिकरण का यह सिलसिला यहीं नहीं थमा, इसके बाद परिवार के लोगों को उनके घर ले जाया गया, जहां घर की छत पर विशेष रूप से प्रहार करके पुरानी नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने का प्रयास किया गया। जनजातीय समाज के जानकारों का कहना है कि यह सदियों पुराना अनुष्ठान वैज्ञानिक रूप से भले ही अजीब लगे, लेकिन उनके लिए यह आत्मा की शुद्धि और समाज में दोबारा सम्मान पाने का एकमात्र जरिया है।

अंधविश्वास का नया खेल या संस्कृति को बचाने की जंग? आमने-सामने आए इंटरनेट यूजर्स

जैसे ही इस अनुष्ठान का वीडियो इंटरनेट पर सामने आया, वैसे ही डिजिटल दुनिया दो धड़ों में बंट गई और परंपरा बनाम अंधविश्वास को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ गई है। कुछ यूजर्स ने भारत के जनजातीय समाज की सराहना करते हुए लिखा कि आधुनिकता की चकाचौंध में भी इन लोगों ने अपनी सांस्कृतिक धरोहर और पुरानी पहचान को जिंदा रखा है। वहीं, दूसरी तरफ कई लोग इसे पुरानी सोच और रूढ़िवादिता का नाम दे रहे हैं। एक यूजर ने तंज कसते हुए लिखा, “अगर हमारे देश में इस तरह का अंधविश्वास न होता, तो आज हम तरक्की के मामले में दुनिया के बड़े देशों से बहुत आगे होते।” वहीं एक अन्य यूजर का कहना था कि अपनी सांस्कृतिक मान्यताओं को घर की चारदीवारी के भीतर निभाना चाहिए, सोशल मीडिया पर इन्हें लाकर सिर्फ दिखावा और तमाशा बनता है। इस विवाद के बीच, गांव में यह अनुष्ठान एक बड़े सामूहिक भोज और जश्न के साथ संपन्न हुआ, जिसने पूरे समुदाय को एक सूत्र में बांधने का काम किया।

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