सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा धर्म से जुड़ा हुआ है और यह हर किसी को नहीं मिल सकता। कोर्ट ने कहा कि संविधान के 1950 के आदेश के अनुसार केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म को मानने वाले ही SC वर्ग में आते हैं। यदि कोई व्यक्ति इन धर्मों को छोड़कर किसी अन्य धर्म को अपनाता है, तो वह अपने आप SC का दर्जा खो देता है। इस फैसले के साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि ऐसे व्यक्ति को आरक्षण या SC/ST एक्ट के तहत मिलने वाली कानूनी सुरक्षा का लाभ नहीं दिया जा सकता।
पादरी की FIR क्यों हुई रद्द
यह मामला आंध्र प्रदेश के एक व्यक्ति से जुड़ा है, जिसने खुद को SC बताते हुए मारपीट और जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल का आरोप लगाते हुए SC/ST एक्ट के तहत FIR दर्ज करवाई थी। आरोपी पक्ष ने इस FIR को चुनौती देते हुए कहा कि शिकायतकर्ता लंबे समय से ईसाई धर्म अपना चुका है और पादरी के रूप में कार्य कर रहा है। इस दलील को Andhra Pradesh High Court ने सही मानते हुए अप्रैल 2025 में FIR को रद्द कर दिया था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने भी सही ठहराया है।
कोर्ट ने प्रमाण पत्र पर भी उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता ने अपना SC प्रमाण पत्र भी पेश किया, जिसमें उसे ‘माडिगा’ जाति का सदस्य बताया गया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यह प्रमाण पत्र पहले ही रद्द हो जाना चाहिए था, क्योंकि व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर चुका है। कोर्ट ने साफ कहा कि केवल जन्म के आधार पर SC का लाभ नहीं लिया जा सकता, अगर व्यक्ति उस धर्म में नहीं है जिसके तहत यह दर्जा मिलता है।
फैसले के दूरगामी असर क्या हो सकते हैं
इस फैसले का असर देशभर में देखने को मिल सकता है, खासकर उन मामलों में जहां धर्म परिवर्तन के बाद भी SC/ST एक्ट का लाभ लिया जा रहा है। कोर्ट के इस निर्णय से यह स्पष्ट संदेश गया है कि कानूनी और संवैधानिक लाभ धर्म के आधार पर तय नियमों के अनुसार ही मिलेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भविष्य में ऐसे मामलों में स्पष्टता आएगी और कानून के दुरुपयोग पर भी रोक लगेगी।








