58 की उम्र में फिर परीक्षा? सुप्रीम कोर्ट के आदेश से 20 लाख शिक्षकों की नौकरी पर संकट, देशभर में उबाल

देशभर के सरकारी शिक्षकों में इस समय भारी असंतोष देखने को मिल रहा है। शनिवार को दिल्ली के रामलीला मैदान में हजारों शिक्षक इकट्ठा हुए और सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ प्रदर्शन किया, जिसमें 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों के लिए TET परीक्षा पास करना अनिवार्य कर दिया गया है। प्रदर्शन में शामिल शिक्षकों का कहना है कि यह फैसला उनके साथ अन्याय है, क्योंकि उन्होंने वर्षों तक छात्रों को पढ़ाया है और अब अचानक उनसे परीक्षा देने को कहा जा रहा है। इस प्रदर्शन में अलग-अलग राज्यों से शिक्षक पहुंचे और एक स्वर में सरकार से इस फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की।

आदेश क्या कहता है — दो साल में TET पास करना जरूरी

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार, शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने से पहले नियुक्त किए गए शिक्षकों को अगले दो वर्षों के भीतर TET परीक्षा पास करनी होगी। ऐसा न करने पर उनकी नौकरी पर खतरा मंडरा सकता है। देशभर में ऐसे शिक्षकों की संख्या लगभग 20 लाख बताई जा रही है, जिनमें से करीब 2 लाख शिक्षक उत्तर प्रदेश से हैं। कोर्ट का मानना है कि शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए यह कदम जरूरी है, लेकिन शिक्षक इसे अपने अनुभव और सेवा के साथ अन्याय मान रहे हैं। उनका कहना है कि जब उन्हें नियुक्त किया गया था, तब यह नियम लागू नहीं था, इसलिए अब इसे थोपना उचित नहीं है।

शिक्षकों का दर्द — “अब हमसे परीक्षा देना संभव नहीं”

प्रदर्शन में शामिल कई शिक्षकों ने अपनी परेशानी खुलकर साझा की। 50 से 58 साल की उम्र के शिक्षक कह रहे हैं कि इस उम्र में परीक्षा देना उनके लिए बेहद मुश्किल है। बिजनौर से आई एक शिक्षिका ने कहा कि उन्होंने पूरी जिंदगी पढ़ाने में लगा दी और अब रिटायरमेंट के करीब उन्हें परीक्षा देने को कहा जा रहा है। शिक्षकों के संगठन Teachers Federation Of India के पदाधिकारियों का कहना है कि यह फैसला ऐसा है जैसे किसी अनुभवी डॉक्टर से दोबारा प्रवेश परीक्षा पास करने को कहा जाए। उनका सुझाव है कि सरकार को पुराने शिक्षकों के लिए परीक्षा के बजाय प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) का विकल्प देना चाहिए, ताकि वे नए शिक्षा सिस्टम के अनुसार खुद को अपडेट कर सकें।

सरकार पर बढ़ा दबाव, समाधान की मांग तेज

इस मुद्दे को लेकर अब सरकार पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। शिक्षकों की मांग है कि 2010 से पहले नियुक्त सभी शिक्षकों को TET से छूट दी जाए और इस संबंध में सरकार अध्यादेश लाए। उनका कहना है कि बिना उनकी बात सुने ऐसा फैसला लेना गलत है और इससे लाखों परिवारों का भविष्य प्रभावित हो सकता है। वहीं, शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस विवाद का समाधान संतुलन बनाकर ही निकाला जा सकता है, ताकि शिक्षा की गुणवत्ता भी बनी रहे और अनुभवी शिक्षकों के साथ अन्याय भी न हो। फिलहाल यह मामला तेजी से राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बनता जा रहा है, जिस पर आने वाले समय में बड़ा फैसला देखने को मिल सकता है।

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