उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के एक छोटे से गांव भैलामऊ से एक ऐसी पहल सामने आई है, जिसने देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के ऊर्जा संकट पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां एक ओर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईंधन की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और गैस संकट की आशंका गहराती जा रही है, वहीं दूसरी ओर 29 वर्षीय युवा आदि उपेंद्र तिवारी ने इसका देसी समाधान खोज निकाला है। विदेश से एमबीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने नौकरी की बजाय अपने गांव को चुना और कचरे को ऊर्जा में बदलने का मिशन शुरू किया। आज उनका लगाया हुआ बायोगैस प्लांट न केवल गैस बना रहा है, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की मिसाल भी पेश कर रहा है।
गोबर और पराली से बन रही ‘ग्रीन गैस’
आदि उपेंद्र तिवारी का यह प्लांट मुख्य रूप से तीन चीजों पर आधारित है—गाय का गोबर, गन्ने की खोई और फसल अवशेष यानी पराली। ये वही चीजें हैं जिन्हें अक्सर बेकार समझकर जला दिया जाता है, जिससे प्रदूषण बढ़ता है। लेकिन इस प्लांट में इन्हीं संसाधनों का उपयोग कर संपीड़ित बायोगैस (CBG) तैयार की जा रही है। खास बात यह है कि यह गैस इतनी शुद्ध होती है कि इसे सीधे वाहनों में CNG के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इस पहल ने यह साबित कर दिया है कि अगर सही तकनीक और सोच हो, तो गांवों में मौजूद संसाधनों से बड़ी समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है।
कार से लेकर रसोई तक पहुंचेगी गैस
इस प्लांट की मौजूदा उत्पादन क्षमता करीब 2.4 टन सीबीजी प्रतिदिन है, जो धीरे-धीरे बढ़ाई जा रही है। इस गैस का उपयोग अभी वाहनों में किया जा रहा है, जिससे पेट्रोल और डीजल पर निर्भरता कम हो रही है। इतना ही नहीं, भविष्य में इस गैस को पाइपलाइन के जरिए घरों तक पहुंचाने की योजना भी है, ताकि गांवों और शहरों में रसोई गैस के रूप में इसका इस्तेमाल हो सके। अधिकारियों का मानना है कि यदि इस मॉडल को बड़े स्तर पर लागू किया गया, तो यह पारंपरिक ईंधनों का मजबूत विकल्प बन सकता है और लोगों को महंगी एलपीजी से राहत मिल सकती है।
किसानों के लिए वरदान साबित होगा मॉडल
इस पहल का सबसे बड़ा फायदा किसानों को मिलने वाला है। जो पराली और कृषि अवशेष पहले बेकार समझे जाते थे, अब वही किसानों की आय का जरिया बन सकते हैं। प्लांट के लिए इन चीजों की खरीद से किसानों को अतिरिक्त आमदनी मिलेगी और साथ ही पराली जलाने की समस्या भी खत्म होगी। आदि उपेंद्र तिवारी का कहना है कि अगर देश के हर गांव में इस तरह के प्लांट लग जाएं, तो भारत को ऊर्जा के लिए दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। यह मॉडल न केवल पर्यावरण के लिए फायदेमंद है, बल्कि देश को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक मजबूत कदम भी है।








