भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर में नया मोड़! हाई कोर्ट में दायर की गई PIL, क्या CBI करेगी मामले की जांच?

बिहार के भोजपुर जिले के आरा क्षेत्र में हुए कथित पुलिस एनकाउंटर का मामला अब न्यायिक गलियारों में पहुंच गया है। यह मामला 28 वर्षीय भरत भूषण तिवारी की मौत से जुड़ा है, जिसे लेकर अब Patna High Court में जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह एक संदिग्ध एनकाउंटर हो सकता है और इसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है। मामला सामने आने के बाद राज्य की कानून-व्यवस्था और पुलिस कार्रवाई की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। याचिकाकर्ता ने अदालत से इस पूरे प्रकरण में स्वतः संज्ञान लेने की अपील भी की है, जिससे मामला और अधिक संवेदनशील बन गया है।

 दोषी पुलिसकर्मियों पर FIR दर्ज करने की अपील

यह PIL इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता गौरव द्विवेदी द्वारा ईमेल और पत्र के माध्यम से भेजी गई है, जिसमें पूरे मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया है कि ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी है। मांग की गई है कि या तो Central Bureau of Investigation (CBI) से जांच कराई जाए या फिर हाईकोर्ट के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की निगरानी में SIT गठित की जाए। साथ ही दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ तुरंत FIR दर्ज करने की भी मांग की गई है, ताकि जांच प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से आगे बढ़ सके और किसी भी तरह की लीपापोती की संभावना खत्म हो।

दस्तावेज सुरक्षित रखने और पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर सवाल

याचिका में यह भी मांग की गई है कि मामले से जुड़े सभी महत्वपूर्ण दस्तावेज सुरक्षित रखे जाएं। इसमें भोजपुर एसपी द्वारा जारी प्रेस नोट, पुलिस लॉगबुक, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अस्पताल के सभी मेडिकल रिकॉर्ड शामिल हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि इन दस्तावेजों के बिना सच सामने आना मुश्किल होगा। यह मामला Bhojpur जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव में 16 और 17 जून की घटना से जुड़ा है, जहां पुलिस मुठभेड़ में भरत भूषण तिवारी की मौत हुई थी। परिवार और सामाजिक संगठनों ने भी इस घटना पर सवाल उठाते हुए इसे संदिग्ध बताया है, जिससे पूरे मामले में पारदर्शिता की मांग और तेज हो गई है।

 संविधान और मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप

अधिवक्ता गौरव द्विवेदी ने अपनी याचिका में दावा किया है कि यह घटना संविधान के अनुच्छेद 21 यानी जीवन के अधिकार का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि कानून के रखवाले ही यदि कानून को अपने हाथ में लेने लगें, तो न्यायपालिका का हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाता है। याचिका में पीड़ित परिवार के लिए अंतरिम आर्थिक सहायता और सुरक्षा की भी मांग की गई है। इस पूरे मामले ने बिहार पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर बहस छेड़ दी है और अब सभी की नजरें Patna High Court के अगले कदम पर टिकी हैं, जिससे यह तय होगा कि मामला CBI जांच तक जाता है या नहीं।

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