गुजरात से सामने आया यह मामला न सिर्फ कानून व्यवस्था बल्कि इंसाफ की रफ्तार पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है. पुलिस कांस्टेबल बाबूभाई प्रजापति पर साल 1996 में महज 20 रुपये की रिश्वत लेने का आरोप लगा था. आरोप यह था कि वेजलपुर पुलिस स्टेशन में तैनात बाबूभाई प्रजापति और उनके दो साथी कांस्टेबल ट्रक ड्राइवरों से शहर में गाड़ियां प्रवेश कराने के बदले 20-20 रुपये वसूलते थे. एंटी करप्शन ब्यूरो ने इस शिकायत के आधार पर जाल बिछाया और तीनों को रंगे हाथ पकड़ने का दावा किया. उस वक्त बाबूभाई की उम्र करीब 34 साल थी और वे अहमदाबाद में रहते थे. एक छोटे से आरोप ने उनकी पूरी जिंदगी की दिशा बदल दी. केस दर्ज होते ही समाज में उनकी छवि पर दाग लग गया और धीरे-धीरे यह मामला उनके जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई बन गया.
सजा, नौकरी से बर्खास्तगी और टूटता हुआ सामाजिक जीवन
मामले की सुनवाई अहमदाबाद की ट्रायल कोर्ट में चली और साल 2004 में कोर्ट ने बाबूभाई प्रजापति समेत तीनों कांस्टेबलों को दोषी ठहरा दिया. अदालत ने उन्हें चार-चार साल की सजा और तीन-तीन हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई. इस फैसले के बाद तीनों की सरकारी नौकरी भी चली गई. बाबूभाई के लिए यह सिर्फ कानूनी हार नहीं थी, बल्कि सामाजिक और मानसिक तौर पर भी बहुत बड़ा झटका था. नौकरी जाने के बाद वे अहमदाबाद छोड़कर पाटण जिले में अपने गृहनगर चले गए. वहीं से उन्होंने आगे की कानूनी लड़ाई लड़ने का फैसला किया. 20 रुपये के आरोप ने उन्हें वर्षों तक मानसिक तनाव, आर्थिक परेशानियों और सामाजिक तानों के बीच जीने को मजबूर कर दिया. इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और न्याय की उम्मीद बनाए रखी.
22 साल बाद हाई कोर्ट ने कहा बेगुनाह, इंसाफ मिला लेकिन देर से
ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ बाबूभाई प्रजापति और उनके साथी कांस्टेबलों ने उसी साल गुजरात हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. लंबा इंतजार, बार-बार की तारीखें और वर्षों की कानूनी प्रक्रिया के बाद आखिरकार 4 फरवरी को गुजरात हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया. जस्टिस एस.वी. पिंटो ने इस मामले में कहा कि अभियोजन पक्ष के गवाहों की गवाही में गंभीर विरोधाभास हैं और जांच प्रक्रिया में भी कई खामियां हैं. कोर्ट ने इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए तीनों कांस्टेबलों को रिश्वत के आरोप से बरी कर दिया. 30 साल बाद बाबूभाई प्रजापति के दामन से वह दाग हट गया, जिसने उनकी पूरी जिंदगी को प्रभावित किया था. फैसले के बाद उन्होंने कहा था कि अब उनकी जिंदगी से कलंक मिट गया है और वे खुद को हल्का महसूस कर रहे हैं.
बरी होने के अगले ही दिन मौत, इंसाफ की खुशी भी अधूरी रह गई
इस कहानी का सबसे भावुक और हैरान करने वाला पहलू तब सामने आया, जब हाई कोर्ट से बरी होने के एक दिन बाद ही बाबूभाई प्रजापति की नींद में मौत हो गई. गुरुवार को वे अपने वकील नितिन गांधी से मिलने उनके कार्यालय पहुंचे थे. वकील ने उन्हें सलाह दी थी कि अब वे सरकार से बकाया वेतन, पेंशन और अन्य लाभों के लिए आवेदन करें. लेकिन बाबूभाई उस समय ज्यादा उत्साहित नहीं दिखे. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्होंने कहा था, “मेरी जिंदगी से दाग हट गया है, अब अगर भगवान मुझे उठा भी ले तो कोई दुख नहीं होगा.” अगले दिन जब वकील ने उन्हें फोन किया, तो पता चला कि उन्हें हार्ट अटैक आया और उनकी मौत हो गई. 30 साल की लंबी लड़ाई जीतने के बाद भी वे इंसाफ की खुशी को ज्यादा समय तक जी नहीं सके. यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि यह सवाल छोड़ जाता है कि अगर न्याय समय पर मिल जाता, तो शायद यह अंत इतना दर्दनाक नहीं होता.
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