देश में झूठी FIR और फर्जी सबूतों के बढ़ते मामलों को लेकर अब Supreme Court of India ने सख्त रुख अपनाया है। इस मुद्दे पर दाखिल एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने केंद्र सरकार और सभी राज्यों को नोटिस जारी किया है। कोर्ट का यह कदम इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि लंबे समय से यह शिकायत उठती रही है कि झूठे मामलों में फंसने वाले लोगों को न्याय पाने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। अदालत अब यह जानना चाहती है कि मौजूदा कानून इन मामलों से निपटने के लिए कितना प्रभावी है और क्या इसमें बदलाव की जरूरत है।
BNSS की धाराओं पर उठे सवाल
इस मामले में वकील Ashwini Upadhyay द्वारा दाखिल याचिका में Bharatiya Nyaya Suraksha Sanhita (BNSS) की कुछ धाराओं को चुनौती दी गई है। खास तौर पर धारा 215 और 379 को लेकर सवाल उठाए गए हैं। याचिका में कहा गया है कि इन प्रावधानों के कारण झूठी FIR दर्ज कराने या फर्जी सबूत पेश करने वालों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई करना आसान नहीं है। मौजूदा कानून में कई प्रक्रियात्मक बाधाएं हैं, जो पीड़ित व्यक्ति को सीधे न्याय पाने से रोकती हैं। यही वजह है कि अदालत से इन नियमों की दोबारा समीक्षा करने की मांग की गई है।
पीड़ितों के अधिकार सीमित, यही सबसे बड़ी चिंता
याचिका में यह भी बताया गया है कि वर्तमान व्यवस्था में झूठी FIR या झूठी गवाही के मामलों में शिकायत दर्ज कराने का अधिकार केवल उस जज के पास होता है, जो मूल केस की सुनवाई कर रहा होता है। इसका मतलब यह है कि पीड़ित व्यक्ति खुद इस तरह की कार्रवाई शुरू नहीं कर सकता। व्यवहार में यह व्यवस्था और भी जटिल हो जाती है, क्योंकि जज आमतौर पर इस प्रक्रिया में शामिल होने से बचते हैं। अगर जज शिकायतकर्ता बनते हैं, तो उन्हें केस से अलग होना पड़ता है और बाद में गवाह के रूप में पेश भी होना पड़ सकता है। इस कारण ज्यादातर मामलों में कार्रवाई शुरू ही नहीं हो पाती, जिससे झूठे मामलों के आरोपी बच निकलते हैं।
क्या बदल सकता है कानून? आगे क्या होगा
याचिका में मांग की गई है कि कानून की ऐसी व्याख्या की जाए, जिससे पीड़ित व्यक्ति को अदालत की अनुमति लेकर खुद झूठी FIR और फर्जी सबूतों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने का अधिकार मिल सके। अगर सुप्रीम कोर्ट इस दिशा में कोई बड़ा फैसला देता है, तो यह आपराधिक न्याय प्रणाली में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। इससे न केवल झूठे मामलों में कमी आ सकती है, बल्कि न्याय प्रक्रिया और अधिक पारदर्शी और मजबूत बन सकती है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि केंद्र और राज्य सरकारें इस नोटिस पर क्या जवाब देती हैं और अदालत इस मामले में आगे क्या रुख अपनाती है।
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