कर्नल श्रीकांत पुरोहित बने ब्रिगेडियर तो भड़के अबू आजमी, कहा-‘यह देश संविधान से चलेगा या मनमानी से?’

भारतीय सेना में कर्नल श्रीकांत पुरोहित को ब्रिगेडियर पद पर पदोन्नति की मंजूरी मिलने के बाद देशभर में नई बहस छिड़ गई है। सेना के इस फैसले को जहां कुछ लोग उनके करियर की स्वाभाविक प्रगति मान रहे हैं, वहीं राजनीतिक हलकों में इसे लेकर सवाल उठने लगे हैं। खासतौर पर 2008 के मालेगांव विस्फोट मामले से जुड़े होने के कारण यह प्रमोशन चर्चा का विषय बन गया है। हालांकि, कोर्ट से बरी होने के बाद सेना ने उन्हें आगे बढ़ने का मौका दिया, लेकिन इस निर्णय ने कई पुराने सवालों को फिर से जीवित कर दिया है।

“देश संविधान से चलेगा या मनमानी से?” – अबू आजमी का तीखा सवाल

महाराष्ट्र समाजवादी पार्टी के नेता अबू आसिम आजमी ने इस पूरे मामले पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि देश को संविधान के आधार पर चलना चाहिए, न कि किसी सरकार की मनमानी पर। आजमी ने आरोप लगाया कि मालेगांव केस में कई ऐसे पहलू थे जिन पर गंभीरता से दोबारा विचार किया जाना चाहिए था। उन्होंने यह भी कहा कि अगर सरकारी वकीलों पर दबाव था और गवाहों को ठीक से पेश नहीं किया गया, तो फिर न्याय प्रक्रिया पर सवाल उठना लाजमी है। उनके मुताबिक, यह मामला केवल एक व्यक्ति के प्रमोशन का नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की पारदर्शिता का भी है।

गवाहों और अपील पर उठे सवाल, सरकार से मांगा जवाब

अबू आजमी ने यह भी मुद्दा उठाया कि इस केस में कई गवाह बाद में विरोधी हो गए और कुछ को अदालत में पेश ही नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि जिन मामलों में गवाहों की भूमिका अहम होती है, वहां इस तरह की चूकें न्याय को प्रभावित कर सकती हैं। उन्होंने सरकार से सवाल किया कि जब अन्य मामलों में, जैसे ट्रेन ब्लास्ट केस में, दोषियों के बरी होने पर तुरंत अपील की जाती है, तो मालेगांव केस में ऐसा क्यों नहीं किया गया? उनके अनुसार, जनता यह जानना चाहती है कि क्या इस मामले में अलग मापदंड अपनाए गए।

“दो तरह का कानून?” – उठी निष्पक्षता पर बहस

अपने बयान में आजमी ने एक और गंभीर मुद्दा उठाते हुए कहा कि क्या देश में अलग-अलग लोगों के लिए अलग कानून लागू हो रहे हैं। उन्होंने एक पूर्व सैन्यकर्मी का उदाहरण देते हुए दावा किया कि कुछ लोगों को जेल से छूटने के बाद भी नौकरी और वेतन नहीं मिला, जबकि अन्य को प्रमोशन दिया जा रहा है। इस तुलना ने पूरे मामले को और संवेदनशील बना दिया है। अब यह बहस केवल एक फैसले तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या न्याय और प्रशासनिक फैसलों में समानता बरती जा रही है या नहीं।

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