राघव चड्ढा को हटाया गया राज्यसभा डिप्टी लीडर से, क्या अब कम हो जाएगी उनकी सैलरी? जवाब है चौंकाने वाला!

राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा को हाल ही में डिप्टी लीडर (उपनेता) के पद से हटा दिया गया है। इस कदम ने राजनीतिक हलकों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। कई लोग यह जानने के लिए उत्सुक हैं कि क्या इस बदलाव के बाद चड्ढा की सैलरी में कोई कटौती होगी। विशेषज्ञ बताते हैं कि डिप्टी लीडर का पद संवैधानिक या वैधानिक नहीं होता, बल्कि यह एक पार्टी-आंतरिक जिम्मेदारी है। इसका मतलब है कि इस पद से हटने पर चड्ढा को मिलने वाले वेतन और भत्तों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। सांसद के तौर पर उन्हें वही मासिक वेतन और भत्ते मिलते रहेंगे जो अन्य सभी राज्यसभा सांसदों को मिलते हैं।

सांसद के वेतन और भत्तों का पूरा ब्यौरा

राज्यसभा सांसद के रूप में राघव चड्ढा को वर्तमान में प्रति माह ₹1,24,000 का मूल वेतन मिलता है। इसके अलावा उन्हें निर्वाचन क्षेत्र भत्ता ₹70,000 और कार्यालय खर्च भत्ता ₹60,000 भी मिलता रहेगा। संसद सत्र या समिति की बैठकों में शामिल होने के लिए उन्हें प्रति दिन ₹2,500 का दैनिक भत्ता भी मिलता है। इन सभी भत्तों और वेतन के साथ सांसद को सरकारी आवास, रेल और हवाई यात्रा की सुविधाएं और CGHS योजना के तहत चिकित्सा लाभ भी मिलते हैं। डिप्टी लीडर के पद से हटने के बावजूद ये सभी सुविधाएं और भत्ते बरकरार रहेंगे।

पद हटने का असली असर जिम्मेदारियों पर

हालांकि वित्तीय नुकसान नहीं है, लेकिन डिप्टी लीडर पद से हटने का असर राघव चड्ढा की राजनीतिक भूमिका और जिम्मेदारियों पर पड़ता है। इस पद के तहत चड्ढा पार्टी की संसदीय रणनीति तैयार करने, सांसदों के बीच अनुशासन बनाए रखने और राज्यसभा सचिवालय के साथ तालमेल रखने जैसी अहम जिम्मेदारियां निभाते थे। अब ये जिम्मेदारियां अशोक मित्तल के पास चली गई हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चड्ढा के प्रभाव में थोड़ी कमी हो सकती है, लेकिन सांसद के तौर पर मिलने वाले अधिकार और विशेषाधिकार उन्हें अब भी मिलते रहेंगे।

सांसद का पद और विशेषाधिकार

डिप्टी लीडर हटाए जाने के बावजूद राघव चड्ढा संसद सदस्य के रूप में पूरे अधिकारों और सुविधाओं के पात्र रहेंगे। वे दिल्ली में सरकारी आवास का लाभ उठा सकते हैं, रेल और हवाई यात्रा मुफ्त कर सकते हैं, और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए CGHS योजना का लाभ ले सकते हैं। वहीं राजनीतिक जिम्मेदारियों में बदलाव होने के कारण उन्हें अब संसदीय रणनीति और पार्टी अनुशासन को संभालने की प्राथमिकता नहीं मिलेगी। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह कदम केवल पद की भूमिका बदलता है, सैलरी या भत्तों में कोई कटौती नहीं करता।

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