Sunday, February 15, 2026

क्या सच में रूस से दूरी बना रहा है भारत? जर्मनी में एस जयशंकर ने अमेरिका को दिया सीधा संदेश

जर्मनी में आयोजित Munich Security Conference के मंच से एक बार फिर भारत की ऊर्जा नीति वैश्विक चर्चा के केंद्र में आ गई। अमेरिका के विदेश मंत्री Marco Rubio ने दावा किया कि भारत ने वॉशिंगटन को आश्वासन दिया है कि वह रूस से अतिरिक्त तेल नहीं खरीदेगा। उनके अनुसार यह प्रतिबद्धता भविष्य की खरीद पर लागू होगी, जबकि जो ऑर्डर पहले से प्रक्रिया में हैं, वे प्रभावित नहीं होंगे। हालांकि इस पर अंतिम निर्णय अभी नहीं हुआ है। India US Trade Deal और रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच ऊर्जा व्यापार का मुद्दा एक संवेदनशील कड़ी बन चुका है। अमेरिका लंबे समय से चाहता है कि उसके सहयोगी देश रूस से ऊर्जा आयात सीमित करें। ऐसे में भारत की स्थिति पर वैश्विक नजरें टिक गई हैं। रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि कुछ भारतीय कंपनियां अप्रैल डिलीवरी के लिए रूसी तेल की खरीद से फिलहाल दूरी बना रही हैं, लेकिन इस पर आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

रणनीतिक स्वायत्तता पर अडिग भारत, जयशंकर का स्पष्ट संदेश

उसी सम्मेलन के अगले सत्र में भारत के विदेश मंत्री S. Jaishankar ने बेहद संतुलित लेकिन स्पष्ट शब्दों में जवाब दिया। उन्होंने कहा कि भारत अपनी “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है। इसका सीधा अर्थ है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है और किसी बाहरी दबाव में निर्णय नहीं लेता। जयशंकर ने यह भी स्पष्ट किया कि ऊर्जा खरीद का निर्णय भावनाओं या वैचारिक दबाव के आधार पर नहीं, बल्कि लागत, उपलब्धता और जोखिम जैसे व्यावहारिक कारकों पर लिया जाता है। उन्होंने कहा कि जिस तरह यूरोप अपनी ऊर्जा जरूरतों के हिसाब से फैसले लेता है, उसी तरह भारत की तेल कंपनियां भी बाजार की परिस्थितियों को देखते हुए निर्णय करती हैं। India US Trade Deal के संदर्भ में उनका यह बयान संकेत देता है कि भारत अमेरिका के साथ साझेदारी को महत्व देता है, लेकिन अपनी आर्थिक जरूरतों से समझौता नहीं करेगा।

टैरिफ, निगरानी और संभावित दबाव की राजनीति

रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिका पहले भी भारत पर दबाव बना चुका है। जानकारी के मुताबिक, अमेरिकी प्रशासन ने पहले भारतीय आयात पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने की चेतावनी दी थी, जिसे बाद में हटाया गया। हालांकि यह भी कहा गया कि अगर भारत प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रूसी तेल आयात बढ़ाता है तो दंडात्मक शुल्क फिर से लागू किया जा सकता है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के कार्यकाल में भी इस मुद्दे पर सख्त रुख देखा गया था, और अब भी अमेरिकी वाणिज्य विभाग को भारतीय तेल आयात पर नजर रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। India US Trade Deal के व्यापक संदर्भ में यह मसला केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापारिक संतुलन, रणनीतिक साझेदारी और वैश्विक राजनीति से भी जुड़ा हुआ है। भारत के लिए यह संतुलन साधना आसान नहीं है—एक ओर अमेरिका के साथ मजबूत संबंध, तो दूसरी ओर सस्ती ऊर्जा की आवश्यकता।

पश्चिमी विचारधारा से अलग रास्ता चुनने का संकेत?

एस जयशंकर ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि भारत के पास ऐसे निर्णय लेने का विकल्प है, जो पश्चिमी विचारधारा से मेल न खाएं। यह बयान कई मायनों में महत्वपूर्ण है। भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और उसे अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित रखना है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया है। ऐसे समय में यदि रूस रियायती दरों पर तेल उपलब्ध कराता है, तो भारत के लिए वह आर्थिक दृष्टि से लाभकारी विकल्प हो सकता है। India US Trade Deal की चर्चाओं के बीच भारत यह संकेत देना चाहता है कि उसकी विदेश नीति बहुध्रुवीय है और वह किसी एक शक्ति केंद्र पर निर्भर नहीं है। जर्मनी में दिए गए जयशंकर के बयान ने यह साफ कर दिया कि भारत सहयोग जरूर करेगा, लेकिन अपनी शर्तों पर। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत-अमेरिका संबंधों और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।

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