देश में बीते कुछ वर्षों में क्विक कॉमर्स का तेजी से विस्तार हुआ और लोगों की आदतों में बड़ा बदलाव देखने को मिला। अब जरूरत का सामान खरीदने के लिए बाजार जाने की जरूरत नहीं रही, बल्कि मोबाइल ऐप पर ऑर्डर करते ही कुछ ही मिनटों में डिलीवरी का वादा किया जाने लगा। खासतौर पर ‘10 मिनट में डिलीवरी’ का दावा ग्राहकों को खूब लुभाने लगा। हालांकि, इस तेज रफ्तार सुविधा के पीछे एक सच्चाई छिपी थी, जो धीरे-धीरे सामने आने लगी। डिलीवरी पार्टनर्स पर समय पर ऑर्डर पूरा करने का भारी दबाव था, जिसके चलते कई बार उन्हें तेज रफ्तार में बाइक चलानी पड़ती थी। गिग वर्कर्स यूनियनों का आरोप रहा कि इस सिस्टम में उनकी सुरक्षा से ज्यादा प्राथमिकता समय को दी जा रही है। इसी वजह से कई हादसों और बढ़ती शिकायतों ने सरकार का ध्यान इस ओर खींचा।
केंद्र सरकार की एंट्री: मंत्री की सख्ती से कंपनियों को बदली रणनीति
डिलीवरी वर्कर्स की बढ़ती समस्याओं को देखते हुए केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री मनसुख मंडाविया ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया। हाल ही में उन्होंने ब्लिंकिट, स्विगी, जोमैटो और जेप्टो जैसी प्रमुख क्विक कॉमर्स कंपनियों के अधिकारियों के साथ बैठक की। इस बैठक में साफ संदेश दिया गया कि किसी भी कीमत पर डिलीवरी पार्टनर्स की जान जोखिम में नहीं डाली जा सकती। मंत्री ने कहा कि सख्त समय सीमा वाले विज्ञापन और दावे वर्कर्स पर मानसिक दबाव डालते हैं, जो सड़क सुरक्षा के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं। बैठक के बाद कंपनियों ने भरोसा दिलाया कि वे अपने प्रचार माध्यमों और ऐप्स से फिक्स्ड डिलीवरी टाइम कमिटमेंट को हटाएंगी। सबसे पहले ब्लिंकिट ने अपने प्लेटफॉर्म से ‘10 मिनट में डिलीवरी’ का दावा पूरी तरह हटा दिया, जबकि अन्य कंपनियां भी इस दिशा में कदम बढ़ा रही हैं।
गिग वर्कर्स की आवाज: विरोध, स्ट्राइक और सुरक्षा की मांग
क्विक कॉमर्स मॉडल के खिलाफ आवाज अचानक नहीं उठी, बल्कि यह लंबे समय से पनप रही नाराजगी का नतीजा थी। डिलीवरी पार्टनर्स और गिग वर्कर्स यूनियनों का कहना था कि अल्ट्रा-फास्ट डिलीवरी मॉडल में उन्हें मौसम, ट्रैफिक और सड़क की हालत की परवाह किए बिना समय पर ऑर्डर पूरा करने को मजबूर किया जाता है। बीते कुछ हफ्तों में कई शहरों में विरोध प्रदर्शन और स्ट्राइक देखने को मिलीं। खासतौर पर न्यू ईयर ईव के मौके पर बड़ी संख्या में वर्कर्स ने काम रोककर सरकार तक अपनी बात पहुंचाई। यूनियनों ने स्पष्ट कहा कि वे सुविधा के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन स्पीड के नाम पर सुरक्षा से समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता। सरकार ने इन मांगों को गंभीरता से सुना और कंपनियों से सीधे बातचीत कर समाधान निकालने की कोशिश की।
आगे क्या बदलेगा: ग्राहकों को असर या सिर्फ प्रचार में बदलाव?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस फैसले के बाद ग्राहकों के लिए क्या बदलेगा। कंपनियों ने स्पष्ट किया है कि डिलीवरी की रफ्तार पूरी तरह से खत्म नहीं होगी, बल्कि अब फोकस सुरक्षित और व्यावहारिक समय पर होगा। यानी ऐप या विज्ञापन में यह दावा नहीं किया जाएगा कि हर हाल में सामान 10 मिनट में ही पहुंचेगा। इससे डिलीवरी पार्टनर्स को बिना जल्दबाजी के काम करने की आजादी मिलेगी और दुर्घटनाओं का जोखिम भी कम होगा। जानकारों का मानना है कि यह फैसला क्विक कॉमर्स इंडस्ट्री के लिए एक टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है, जहां अब सिर्फ स्पीड नहीं बल्कि वर्कर्स की भलाई और सुरक्षा को भी बराबर महत्व मिलेगा। आने वाले समय में यह मॉडल इंडस्ट्री के लिए ज्यादा टिकाऊ और भरोसेमंद बन सकता है।
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