पुणे जिले के पिंपर्खेड गांव में इन दिनों जैसे हवा में भी एक डर तैर रहा है। गांव के कई इलाकों में तेंदुओं की लगातार बढ़ती मौजूदगी ने किसानों की दिनचर्या को पूरी तरह बदल दिया है। लोग सुबह-सुबह खेतों में निकलने से पहले पीछे मुड़कर कई बार देखने लगे हैं। खेतों के किनारे पड़े पैरों के निशान, रातों में पालतू जानवरों के गायब होने की खबरें और गांव के आसपास चहल-कदमी करते जंगली जानवरों ने माहौल को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया है।
लेकिन इससे भी ज्यादा हैरान कर देने वाली बात यह है कि किसानों ने इस खतरे से निपटने के लिए जो उपाय अपनाया है, वह किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं। गांव के खेतों में इन दिनों किसान गले में कांटेदार कॉलर पहनकर काम करते नजर आते हैं—बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी शिकारी कुत्ते को बचाने के लिए सुरक्षा उपकरण लगाया जाता है। यह अनोखा जुगाड़ अब लोगों के बीच बहस का विषय बन गया है और इसके पीछे की कहानी और भी चौंकाने वाली है।
कांटेदार कॉलर: मजबूरी का जुगाड़ या देहात की देसी ढाल?
पहली नजर में कोई भी सोच सकता है कि आखिर किसान ऐसा अजीब उपकरण क्यों पहन रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि तेंदुए अक्सर अपने शिकार पर पीछे से हमला करते हैं और सबसे पहले गर्दन को निशाना बनाते हैं। इसी कमजोरी को ताकत में बदलते हुए गांव के लोगों ने लोहे, साइकिल चेन, नुकीले तार और धातु के छोटे-छोटे कांटों की मदद से एक देसी सुरक्षा कवच तैयार किया है।
जब किसान झुककर फसल काटते हैं, घास साफ करते हैं या खेत में अकेले काम करते हैं, तो यही कॉलर उनकी जान बचाने का काम करता है। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि तेंदुए की पकड़ बेहद मजबूत होती है, और अगर पहली बार में उसके दांत गर्दन में धंस जाएं, तो बचने के मौके बहुत कम रह जाते हैं। यह कांटेदार पट्टा तेंदुए के हमले को या तो विफल कर देता है या किसान को कुछ सेकंड मिल जाते हैं बचाव का रास्ता पकड़ने के लिए।
कई लोगों का कहना है कि ये कॉलर असहज जरूर हैं, वजनदार भी हैं, लेकिन डर के सामने यह असुविधा बहुत छोटी है।
रात का सन्नाटा और गांव में फैला खौफ
गांव में बच्चे शाम ढलते ही घरों में कैद हो जाते हैं, जबकि महिलाएं अकेले खेतों में जाना लगभग बंद कर चुकी हैं। कई परिवारों ने छोटे-छोटे समूह बनाकर ही खेतों में जाना शुरू कर दिया है। रात को कुत्तों के अचानक भौंकने की आवाजें दिल की धड़कनें बढ़ा देती हैं।
तेंदुए द्वारा पहले किए गए हमलों की कहानियां गांव में एक डर की परत छोड़ गई हैं। कई बार तेंदुए खेतों के किनारों पर बनाए गए शेड या झोपड़ियों तक पहुंच चुके हैं। कुछ किसानों के मवेशी भी शिकार बने हैं। वन विभाग की टीम समय-समय पर गश्त करती है, लेकिन क्षेत्र का भौगोलिक फैलाव और पास के जंगलों से तेंदुओं की आवाजाही रोकना आसान नहीं। इसी माहौल में किसान मानते हैं कि कांटेदार कॉलर उनके लिए सिर्फ एक सुरक्षा उपाय नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में आत्मविश्वास वापस पाने का तरीका भी है।
समाधान की तलाश: तकनीक, जागरूकता और उम्मीद की नई किरण
गांव के लोग अब किसी स्थायी समाधान की उम्मीद कर रहे हैं। वन विभाग ने कैमरा ट्रैप लगाए हैं, जागरूकता कैंप भी चलाए जा रहे हैं, लेकिन ग्रामीणों का मानना है कि इससे ज्यादा प्रभावी रणनीति की जरूरत है। कुछ विशेषज्ञ गांव के आसपास सोलर फेंसिंग लगाने की बात कर रहे हैं, तो कुछ गांव के प्रवेश मार्गों पर नाइट लाइटिंग की व्यवस्था की मांग कर रहे हैं।
कई युवा अब खुद भी सुरक्षा उपायों में इनोवेशन करने में लग गए हैं। कोई स्मार्ट अलार्म सिस्टम बना रहा है तो कोई खेतों में मूवमेंट सेंसर लगाने की योजना कर रहा है। गांव की महिलाएं भी इन कॉलर्स को हल्का और मजबूत बनाने में हाथ बंटा रही हैं। पूरे गांव की यह सामूहिक कोशिश दिखाती है कि जब खतरा बड़ा हो, तो इंसान का साहस और जुगाड़ की ताकत उससे भी बड़ी हो सकती है। और फिलहाल, यही कांटेदार कॉलर किसानों की जान बचाने वाला सबसे भरोसेमंद साथी बन चुका है।








