Wednesday, January 28, 2026

बारामती हादसा: सत्ता के शिखर पर पहुंचे अजित पवार, सीएम बनने से पहले कैसे थम गया सफर?

महाराष्ट्र के बारामती से बुधवार को सामने आई एक बड़ी खबर ने पूरे राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी। चुनाव प्रचार के लिए रवाना हुए उपमुख्यमंत्री अजित पवार जिस विमान से यात्रा कर रहे थे, उसी विमान के क्रैश होने की सूचना मिली। यह घटना उस समय सामने आई जब अजित पवार पंचायत समिति और जिला परिषद चुनावों के लिए लगातार जनसभाएं करने वाले थे। हादसे की खबर फैलते ही प्रशासन, सुरक्षा एजेंसियों और राजनीतिक दलों में अफरा-तफरी मच गई और सभी की निगाहें बारामती पर टिक गईं।

अजित पवार का दिनभर का कार्यक्रम पहले से तय था। सुबह से लेकर शाम तक चार अलग-अलग इलाकों में उनकी जनसभाएं प्रस्तावित थीं। इन सभाओं का उद्देश्य महायुति गठबंधन के उम्मीदवारों के लिए समर्थन जुटाना था। लेकिन विमान हादसे की खबर आते ही पूरा शेड्यूल रद्द हो गया और चुनावी माहौल अचानक शोक में बदल गया। स्थानीय प्रशासन ने तुरंत राहत और सुरक्षा इंतजाम तेज किए, जबकि राजनीतिक दलों ने घटनाक्रम पर नजर बनाए रखी।

यह हादसा केवल एक तकनीकी दुर्घटना नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे महाराष्ट्र की राजनीति के लिए एक बड़ा झटका बताया जा रहा है। अजित पवार लंबे समय से राज्य की सत्ता में अहम भूमिका निभाते रहे हैं और ऐसे समय में यह घटना सामने आना राजनीतिक रूप से भी काफी संवेदनशील मानी जा रही है।

राजनीति से जुड़ा हर रिश्ता

अजित पवार का नाम महाराष्ट्र की राजनीति में किसी पहचान का मोहताज नहीं रहा है। वे पवार परिवार की उस राजनीतिक विरासत से आते हैं, जिसने दशकों तक राज्य की दिशा तय की है। उनके चाचा शरद पवार को महाराष्ट्र और देश की राजनीति का बड़ा चेहरा माना जाता है। अजित पवार का परिवार हमेशा सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहा है।

उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार सामाजिक और राजनीतिक कार्यक्रमों में कई बार उनके साथ नजर आती रही हैं। बड़े बेटे पार्थ पवार ने भी राजनीति में कदम रखा और चुनाव लड़ा, हालांकि उन्हें सफलता नहीं मिली। छोटे बेटे जय पवार अपेक्षाकृत कम सार्वजनिक जीवन में रहे हैं, लेकिन परिवार के साथ कई मौकों पर दिखते रहे हैं। अजित पवार की बहन विजया पाटिल और बड़े भाई श्रीनिवास पवार भी परिवार का अहम हिस्सा हैं।

पवार परिवार की पहचान केवल सत्ता तक सीमित नहीं रही है, बल्कि सहकारिता, शिक्षा और ग्रामीण विकास में भी इस परिवार की गहरी पकड़ रही है। यही वजह रही कि अजित पवार को बारामती क्षेत्र में हमेशा मजबूत जनाधार मिला। परिवार की राजनीतिक विरासत ने उन्हें आगे बढ़ने का रास्ता दिया, लेकिन उसी विरासत के कारण उनसे अपेक्षाएं भी हमेशा ज्यादा रहीं।

अजित पवार का सियासी सफर: संघर्ष, सत्ता और विवाद

अजित पवार का राजनीतिक सफर आसान नहीं रहा। उनका जन्म 22 जुलाई 1959 को हुआ था। पिता के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारियां उन पर जल्दी आ गईं, जिसके कारण उन्हें पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी। इसके बाद उन्होंने सहकारी क्षेत्र से राजनीति की शुरुआत की और चीनी मिलों व सहकारी संस्थाओं से जुड़े।

1991 में वे पहली बार बारामती से लोकसभा सांसद बने। हालांकि बाद में उन्होंने यह सीट अपने चाचा शरद पवार के लिए छोड़ दी। इसके बाद उनका राजनीतिक सफर विधानसभा और राज्य सरकार के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा। 1999 के बाद जब महाराष्ट्र में एनसीपी की सरकार बनी, तब अजित पवार को कई अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी मिली।

2010 से लेकर अब तक वे रिकॉर्ड छह बार महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री बने। यह अपने आप में एक बड़ा राजनीतिक रिकॉर्ड है। हालांकि वे कभी मुख्यमंत्री नहीं बन पाए, लेकिन सत्ता के केंद्र में उनकी मौजूदगी हमेशा बनी रही। उनकी राजनीति में कई बार बगावत, गठबंधन बदलने और सत्ता संघर्ष जैसे मोड़ आए, लेकिन इसके बावजूद वे बारामती की राजनीति में मजबूत बने रहे।

उनके कार्यकाल में विकास कार्यों के साथ-साथ विवाद भी जुड़े रहे। सिंचाई परियोजनाओं को लेकर सवाल उठे, सूखे पर दिए गए कुछ बयानों की आलोचना हुई, लेकिन उनके समर्थकों ने उन्हें एक कामकाजी और निर्णय लेने वाला नेता माना। यही वजह रही कि तमाम विवादों के बावजूद वे बार-बार सत्ता में लौटते रहे।

राजनीति पर असर और अधूरा सपना

अजित पवार को लेकर हमेशा यह चर्चा होती रही कि वे मुख्यमंत्री बन सकते हैं। कई मौकों पर परिस्थितियां भी बनीं, लेकिन किसी न किसी कारण से उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका। छह बार उपमुख्यमंत्री बनने के बावजूद मुख्यमंत्री की कुर्सी उनसे एक कदम दूर ही रही।

2023 में एनसीपी में हुई बगावत और अलग गुट बनाने के बाद वे फिर से सत्ता में लौटे और महायुति सरकार का हिस्सा बने। 2024 में चुनाव चिन्ह और पार्टी नाम मिलने के बाद उनका कद और बढ़ा, लेकिन उसी के साथ राजनीतिक जिम्मेदारियां भी बढ़ गईं।

बारामती विमान हादसे की खबर ने न सिर्फ उनके समर्थकों को, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र को सोचने पर मजबूर कर दिया है। अगर यह घटना नहीं होती, तो आने वाले समय में अजित पवार महाराष्ट्र की राजनीति में और बड़ी भूमिका निभा सकते थे। उनके जाने से राज्य की राजनीति में एक बड़ा खालीपन पैदा होना तय माना जा रहा है।

अजित पवार का नाम अब सिर्फ सत्ता की राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उनके संघर्ष, रिकॉर्ड और अधूरे सपनों के साथ हमेशा याद किया जाएगा।

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