Tuesday, January 13, 2026

“संविधान इजाज़त देता है, लेकिन…” हिजाब वाली पीएम पर ओवैसी के बयान से क्यों भड़के असम सीएम?

भारत की राजनीति में एक बार फिर धर्म, संविधान और प्रधानमंत्री पद को लेकर बहस तेज हो गई है। AIMIM प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी के एक बयान ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। महाराष्ट्र के सोलापुर में नगर निकाय चुनाव से पहले आयोजित एक जनसभा में ओवैसी ने कहा कि भारतीय संविधान सभी नागरिकों को बराबरी का अधिकार देता है और भविष्य में वह दिन जरूर आएगा जब हिजाब पहनने वाली महिला भारत की प्रधानमंत्री बनेगी। उन्होंने यह भी जोड़ा कि शायद वह खुद उस दिन को देखने के लिए जीवित न रहें, लेकिन देश का लोकतंत्र और संविधान इस संभावना को पूरी तरह स्वीकार करता है। ओवैसी के इस बयान को जहां उनके समर्थकों ने संविधान की भावना से जोड़कर देखा, वहीं विपक्ष, खासकर बीजेपी ने इसे राजनीतिक और वैचारिक उकसावे वाला बयान करार दिया। यहीं से यह मुद्दा केवल एक भाषण तक सीमित न रहकर राष्ट्रीय बहस का रूप लेने लगा।

“संविधान में कोई रोक नहीं, लेकिन…” असम सीएम का पलटवार

ओवैसी के बयान पर असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारतीय संविधान के अनुसार कोई भी नागरिक प्रधानमंत्री बन सकता है, चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या समुदाय से क्यों न हो। उन्होंने स्पष्ट किया कि संविधान में इस बात की कोई रोक नहीं है कि कोई महिला या किसी विशेष धार्मिक पहचान वाली व्यक्ति प्रधानमंत्री नहीं बन सकती। हालांकि, इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि भारत एक हिंदू-बहुल देश है और अब तक देश के सभी प्रधानमंत्री हिंदू समुदाय से रहे हैं। सीएम सरमा के इसी “लेकिन” शब्द ने सियासी बहस को और तेज कर दिया। उनके बयान को कुछ लोग ऐतिहासिक तथ्य मान रहे हैं, तो कुछ इसे भविष्य की संभावनाओं को सीमित करने वाला तर्क बता रहे हैं। असम सीएम के बयान के बाद यह चर्चा और गहरी हो गई कि क्या लोकतंत्र में केवल बहुमत की पहचान ही नेतृत्व तय करती है या फिर संविधान की समानता की भावना भविष्य में नए उदाहरण भी गढ़ सकती है।

बीजेपी की तीखी प्रतिक्रिया और बढ़ता सियासी तापमान

ओवैसी के बयान पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने कड़ी आपत्ति जताई। बीजेपी सांसद अनिल बोंदे ने इसे गैरजिम्मेदाराना बताते हुए कहा कि ओवैसी आधा सच सामने रख रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि मुस्लिम समाज की कई महिलाएं हिजाब पहनने को मजबूरी मानती हैं और ईरान में हिजाब के खिलाफ हुए प्रदर्शनों का हवाला देते हुए कहा कि कोई भी गुलामी पसंद नहीं करता। बोंदे ने यह भी कहा कि भारत में जनसांख्यिकीय असंतुलन उभर रहा है, इसलिए हिंदू समाज की एकता जरूरी है। वहीं, बीजेपी सांसद भोला सिंह ने अपेक्षाकृत संतुलित प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा, इसका फैसला देश की जनता करती है। उन्होंने साफ कहा कि संविधान में ऐसा कोई नियम नहीं है जो किसी महिला या किसी खास समुदाय को प्रधानमंत्री बनने से रोकता हो। भोला सिंह के अनुसार, प्रधानमंत्री का चयन राजनीतिक दलों के नेतृत्व और जनता के मतदान से तय होता है, न कि किसी धार्मिक पहचान से। इन बयानों के बाद साफ हो गया कि यह मुद्दा केवल एक व्यक्ति के बयान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह लोकतंत्र, धर्म और सत्ता की प्रकृति पर व्यापक बहस का कारण बन चुका है।

लोकतंत्र, पहचान और भविष्य की राजनीति

इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि भारतीय लोकतंत्र किस दिशा में आगे बढ़ रहा है। ओवैसी का बयान जहां संविधान की समानता और समावेशी सोच पर जोर देता है, वहीं असम सीएम और बीजेपी नेताओं की प्रतिक्रियाएं देश की सामाजिक संरचना और मौजूदा राजनीतिक यथार्थ की ओर इशारा करती हैं। भारत में अब तक महिला प्रधानमंत्री भी बनी हैं, लेकिन धार्मिक पहचान के आधार पर भविष्य की कल्पना करना अभी भी सियासी बहस का विषय बना हुआ है। जानकारों का मानना है कि ऐसे बयान चुनावी माहौल में अक्सर वोट बैंक को साधने के लिए दिए जाते हैं, लेकिन इनका असर समाज में गहरी वैचारिक बहस के रूप में सामने आता है। यह बहस आने वाले समय में और तेज हो सकती है, खासकर तब जब देश में महिला नेतृत्व, अल्पसंख्यक अधिकार और संविधान की व्याख्या जैसे मुद्दे लगातार चर्चा में हैं। फिलहाल इतना तय है कि “हिजाब वाली प्रधानमंत्री” वाला बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक भविष्य को लेकर चल रही बड़ी बहस का प्रतीक बन चुका है।

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