भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील की घोषणा के बाद जहां सरकार समर्थक खेमे में इसे बड़ी कूटनीतिक सफलता बताया जा रहा है, वहीं विपक्ष की ओर से इस समझौते पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। शिवसेना उद्धव गुट की राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ’ पर किए गए पोस्ट का हवाला देते हुए इस डील की मंशा और असर पर शंका जताई है। प्रियंका का कहना है कि जो जानकारी अब तक सामने आई है, वह भारत के हित में कम और अमेरिकी हितों के ज्यादा करीब नजर आती है। उन्होंने इशारों में दावा किया कि इस समझौते से भारत को फायदा होने के बजाय नुकसान उठाना पड़ सकता है। सांसद ने यह भी कहा कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय डील को जनता के हित की कसौटी पर परखा जाना चाहिए, न कि सिर्फ राजनीतिक प्रचार के आधार पर।
टैरिफ में कटौती के बदले क्या भारत ने ज्यादा समझौता किया?
प्रियंका चतुर्वेदी ने अपने पोस्ट में कहा कि ट्रंप की जानकारी के मुताबिक भारत पर लगने वाला रेसिप्रोकल टैरिफ 25 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी किया गया है। पहली नजर में यह भारत के लिए राहत की बात लग सकती है, लेकिन इसके बदले भारत अमेरिका के खिलाफ अपने टैरिफ और नॉन-टैरिफ बैरियर लगभग शून्य करने पर सहमत होता दिख रहा है। सांसद का सवाल है कि क्या यह संतुलित समझौता है। उन्होंने लिखा कि अगर अमेरिका को भारतीय बाजार में बिना रुकावट एंट्री मिलती है, तो घरेलू उद्योगों पर इसका सीधा असर पड़ेगा। छोटे और मझोले कारोबार पहले ही महंगाई और प्रतिस्पर्धा से जूझ रहे हैं। ऐसे में टैरिफ और अन्य सुरक्षा उपाय हटाने से भारतीय कंपनियों को नुकसान हो सकता है। प्रियंका ने यह भी कहा कि इस डील की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है, जिससे संदेह और गहरा होता है।
तेल नीति पर सवाल: रूस-ईरान छोड़ वेनेजुएला क्यों?
प्रियंका चतुर्वेदी ने ट्रेड डील के ऊर्जा से जुड़े पहलुओं पर भी तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने लिखा कि इस समझौते के तहत भारत रूसी तेल की खरीद रोकने और ईरान से कच्चा तेल न लेने पर सहमत होता दिख रहा है। इसके उलट भारत के वेनेजुएला से तेल खरीदने की बात सामने आ रही है। सांसद का कहना है कि यह फैसला किसके हित में है, यह साफ नहीं है। भारत अब तक अपनी ऊर्जा जरूरतों को संतुलित और किफायती तरीके से पूरा करता रहा है। रूस और ईरान से तेल खरीद भारत के लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद रही है। ऐसे में इन विकल्पों को छोड़ना देश की ऊर्जा सुरक्षा पर सवाल खड़े करता है। प्रियंका ने यह भी याद दिलाया कि भारत के कुल कच्चे तेल आयात में वेनेजुएला का हिस्सा पहले से ही करीब 10 फीसदी के आसपास है, ऐसे में इसे बढ़ाना क्या वाकई जरूरी था।
‘जो इसे अच्छी डील मानते हैं, वो बहुत भोले हैं’
प्रियंका चतुर्वेदी ने एक अन्य पोस्ट में और भी कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने लिखा कि अमेरिकी एलपीजी आयात के लिए भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र की रिफाइनरियों से जुड़े समझौते, और SHANTI बिल 2025 जैसे कदम अमेरिकी मांगों को पूरा करने की दिशा में दिखते हैं। इस बिल से न्यूक्लियर पावर सेक्टर में निजी कंपनियों की एंट्री आसान हो सकती है, जिसे लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। सांसद ने दावा किया कि इस ट्रेड डील के तहत भारत अमेरिका से ऊर्जा, कृषि, कोयला और अन्य उत्पादों की करीब 500 अरब डॉलर की खरीद कर सकता है, जबकि मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका को भारत का वस्तु निर्यात करीब 41.5 अरब डॉलर और सेवाओं का निर्यात लगभग 41.8 अरब डॉलर रहा है। यही वजह है कि उन्होंने कहा—“जो कोई भी सोचता है कि यह भारत के लिए बहुत अच्छी डील है, वो बहुत भोले लोग हैं।” उनके मुताबिक देश में इस समझौते को लेकर उत्साह तो दिखाया जा रहा है, लेकिन जश्न दबा-दबा है और जानकारी सीमित रखी गई है, जो अपने आप में कई सवाल खड़े करता है।
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