Wednesday, January 14, 2026

क्या यूपी में बड़ा उलटफेर होने वाला है? केशव प्रसाद मौर्य को लेकर भाजपा के भीतर ‘बड़ी चाल’ की चर्चा तेज़!

उत्तर प्रदेश की राजनीति इस समय एक दिलचस्प मोड़ से गुजर रही है। चर्चाएं इस कदर तेज़ हैं कि यह सवाल लगातार उठ रहा है, क्या उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का ’लंबे समय से रोका हुआ सुपर प्रमोशन’ अब सच में हकीकत बनने वाला है? पार्टी के भीतर उनकी सक्रियता बढ़ी है, राष्ट्रीय स्तर पर उनकी मौजूदगी पहले से कहीं ज्यादा दिख रही है और बिहार में भाजपा विधानमंडल दल के नेता चुनने के लिए उन्हें पर्यवेक्षक बनाना इस चर्चा को और मजबूत करता है। लंबे समय से वे बड़ी भूमिका के दावेदार माने जाते रहे हैं, और कई बार ऐसा भी कहा गया कि योगी आदित्यनाथ से उनकी दूरी इसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण बढ़ी। लेकिन अब जब पार्टी का फोकस राष्ट्रीय रणनीति और ओबीसी समीकरण पर है, तब मौर्य का कद तेजी से ऊपर उठता दिख रहा है।

बढ़ती भीड़, बढ़ती ताकत—मौर्य के आसपास अचानक क्यों बढ़ गई हलचल?

पिछले कुछ दिनों में केशव प्रसाद मौर्य के आसपास जिस तरह लोगों और नेताओं की आवाजाही बढ़ी है, उससे साफ महसूस होता है कि कुछ बड़ा पक रहा है। यूपी में भाजपा नेताओं के बीच यह सामान्य चर्चा बन चुकी है कि मौर्य को जिन्हें कभी सिर्फ ‘संतुलन का चेहरा’ माना जाता था, अब वे पार्टी नेतृत्व की प्राथमिकता सूची में काफी ऊपर पहुंच गए हैं।

कई कार्यक्रमों में उनकी बढ़ती उपस्थिति और केंद्रीय नेताओं के साथ बढ़ती तस्वीरें राजनीतिक संकेतों की एक नई लड़ी पेश कर रही हैं। खासकर तब जब गृहमंत्री अमित शाह ने कुछ महीनों पहले सार्वजनिक मंच पर उन्हें अपना ‘मित्र’ कहकर संबोधित किया था। भाजपा की राजनीति में इस तरह के शब्द यूं ही नहीं बोले जाते इनके पीछे हमेशा एक संदेश छिपा होता है।

भाजपा फिलहाल उस दौर में है जहां उसे अपने ओबीसी वोट बैंक को फिर से मजबूत करना है। 2014 से लेकर 2017 तक भाजपा के पास एक मजबूत ऊपरी जाति + ओबीसी गठजोड़ था, जिसने पार्टी को अभूतपूर्व जीत दिलाई। लेकिन 2022 विधानसभा और विशेषकर 2024 लोकसभा चुनावों ने यह संकेत दे दिया कि ओबीसी मतों में भाजपा की पकड़ कमज़ोर हुई है। ऐसे में ओबीसी समाज से आने वाला बड़ा चेहरा स्वाभाविक रूप से पार्टी की रणनीति के केंद्र में आ सकता है और वह नाम है केशव प्रसाद मौर्य।

क्या भाजपा मौर्य पर दांव लगाकर ओबीसी वोटों को फिर ‘लॉक’ करना चाहती है?

भाजपा की आंतरिक चुनावी रिपोर्टों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में 2027 का चुनाव पार्टी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल है। 2022 में सीटें कम होना और 2024 में यूपी से बेहद निराशाजनक लोकसभा प्रदर्शन ने पार्टी को साफ संकेत दे दिया है कि उसे ओबीसी वर्ग को फिर अपने साथ लाने के लिए बड़े चेहरे की जरूरत पड़ेगी।

केशव प्रसाद मौर्य इसी वजह से केंद्र में आ जाते हैं। 2017 में जब भाजपा ने रिकॉर्ड तोड़ जीत हासिल की थी, मौर्य उस समय प्रदेश भाजपा अध्यक्ष थे और ओबीसी मतदाताओं को जोड़ने में उनकी भूमिका को आज भी महत्वपूर्ण माना जाता है। उनकी पकड़ गांवों, छोटे शहरों और बूथ स्तर तक जाती है और यह वही नेटवर्क है जिसे भाजपा 2027 के लिए फिर से सक्रिय करना चाहती है।

पार्टी के भीतर यह भी माना जा रहा है कि मौर्य की जमीन-स्तरीय पकड़ और उनकी जाति आधारित स्वाभाविक स्वीकार्यता भाजपा को 2027 में निर्णायक फायदा पहुंचा सकती है। यही वजह है कि पार्टी उन्हें सिर्फ सम्मानजनक पद पर नहीं रखना चाहेगी, बल्कि ऐसा रोल दे सकती है जो सीधे चुनावी परिणामों में फर्क लाए—चाहे वह संगठन में राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी हो या प्रदेश में कोई बड़ा परिवर्तन।

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