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तारिक रहमान की शपथ के 24 घंटे बाद बिलाल एर्दोगन का अचानक ढाका दौरा, क्यों बढ़ी भारत की चिंता?

बांग्लादेश के नए पीएम तारिक रहमान की शपथ के तुरंत बाद तुर्की के राष्ट्रपति के बेटे बिलाल एर्दोगन का ढाका दौरा, रोहिंग्या रिफ्यूजी कैंप और राजनीतिक गुटों से संपर्क के कारण भारत में बढ़ी सुरक्षा चिंताएं।

बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान की शपथ ग्रहण के ठीक एक दिन बाद तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन के बेटे बिलाल एर्दोगन बुधवार सुबह ढाका पहुंचे। यह दौरा बिना किसी सार्वजनिक सूचना के हुआ, जिससे अचानक ही राजनीतिक चर्चा शुरू हो गई। बिलाल का आगमन बताता है कि तुर्की बांग्लादेश की नई सरकार में जल्दी से अपना प्रभाव बनाना चाहता है। पिछले कुछ सालों में तुर्की ने बांग्लादेश के दक्षिणपंथी और कट्टरपंथी समूहों के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया है। ऐसे में बिलाल का यह दौरा सिर्फ औपचारिक नहीं, बल्कि रणनीतिक माना जा रहा है।

राजनीतिक और सामाजिक कार्यक्रमों में भागीदारी

बिलाल एर्दोगन के साथ पूर्व फुटबॉलर मेसुत ओजिल और तुर्की की सरकारी सहायता एजेंसी TIKA के चेयरमैन अब्दुल्ला आरोन भी ढाका आए। बिलाल ने ढाका यूनिवर्सिटी के मेडिकल सेंटर का उद्घाटन किया, जिसे TIKA ने फंड किया है। इसके अलावा उनका कॉक्स बाजार में रोहिंग्या रिफ्यूजी कैंप का दौरा भी तय है। विशेषज्ञों का कहना है कि बिलाल का यह दौरा धार्मिक और राजनीतिक गुटों के साथ संपर्क बढ़ाने का हिस्सा है। टुर्की की तरफ से बांग्लादेश में ऐसे कदमों को क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

भारत की बढ़ती चिंता

भारत पहले से ही बांग्लादेश की नई सरकार के साथ अपने संबंध मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। वहीं, बिलाल एर्दोगन का दौरा और TIKA की सक्रियता ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। बांग्लादेश में धार्मिक गुटों से जुड़ाव और रोहिंग्या कैंप में तुर्की की भागीदारी पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा के लिए चुनौती बन सकती है। पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के समय तुर्की और उसकी एजेंसियों ने पाकिस्तान के साथ खुलकर खड़े रहकर भारत की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाया था। अब बांग्लादेश में बढ़ती तुर्की की सक्रियता से भारत के लिए सतर्क रहने की जरूरत और बढ़ गई है।

तुर्की की बढ़ती प्रभावशीलता और बांग्लादेश की राजनीति

बिलाल एर्दोगन का ढाका दौरा यह संकेत देता है कि तुर्की बांग्लादेश की राजनीति में सीधे तौर पर कदम रख रहा है। रोहिंग्या रिफ्यूजी कैंप और स्थानीय राजनीतिक गुटों से जुड़ाव से यह साफ है कि तुर्की नई सरकार में अपनी पैठ बनाना चाहता है। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में भारत, बांग्लादेश और तुर्की के बीच राजनीतिक और सुरक्षा मामलों में संतुलन बनाने की चुनौती बढ़ सकती है। यह दौरा क्षेत्रीय राजनीति के नए दौर की शुरुआत के रूप में भी देखा जा रहा है।

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