अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की राजनीति एक बार फिर सुर्खियों में है। हाल के महीनों में यह देखा गया है कि भारत अमेरिका से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीद रहा है, जबकि चीन रूस और ईरान जैसे देशों से रियायती दरों पर तेल ले रहा है। इससे सवाल उठने लगे हैं कि क्या भारत को महंगा तेल खरीदना पड़ रहा है और क्या इसके पीछे वैश्विक दबाव या कूटनीतिक समीकरण काम कर रहे हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump के दौर में ऊर्जा नीति को लेकर जो आक्रामक रुख अपनाया गया था, उसका असर अब भी वैश्विक बाजार पर देखा जा रहा है। भारत, जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है, अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से पूरा करता है। ऐसे में कीमतों में मामूली अंतर भी अर्थव्यवस्था पर बड़ा प्रभाव डालता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका से आयातित तेल की कीमत कई बार परिवहन लागत और अनुबंध शर्तों के कारण अधिक पड़ती है, जबकि रूस और ईरान पर पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण चीन को छूट मिल जाती है।
चीन को रूस-ईरान से छूट, भारत के सामने संतुलन की चुनौती
चीन ने बीते वर्षों में Russia और Iran से रियायती तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा जरूरतों को सस्ता बनाए रखा है। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के चलते इन देशों को अपना तेल कम कीमत पर बेचना पड़ा, जिसका फायदा चीन ने उठाया। दूसरी ओर भारत ने भी रूस से तेल खरीदा है, लेकिन उसे अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ अपने रणनीतिक रिश्तों का भी ध्यान रखना पड़ता है। China की तुलना में भारत का वैश्विक संतुलन ज्यादा जटिल है, क्योंकि उसे अमेरिका, रूस, मध्य पूर्व और अन्य देशों के साथ रिश्तों को संतुलित रखना होता है। ऊर्जा विश्लेषकों का मानना है कि भारत की खरीद रणनीति केवल कीमत पर आधारित नहीं होती, बल्कि दीर्घकालिक आपूर्ति सुरक्षा, भुगतान प्रणाली और कूटनीतिक दबाव जैसे कारकों को भी ध्यान में रखा जाता है। यही कारण है कि कई बार भारत को अपेक्षाकृत महंगा अमेरिकी तेल लेना पड़ता है, ताकि रणनीतिक साझेदारी मजबूत बनी रहे।
भारत-अमेरिका संबंध और पीएम मोदी की रणनीति
भारत और अमेरिका के बीच पिछले एक दशक में रणनीतिक साझेदारी मजबूत हुई है। United States भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अहम सहयोगी मानता है। प्रधानमंत्री Narendra Modi की सरकार ने भी अमेरिका के साथ रक्षा, तकनीक और ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाया है। ऐसे में ऊर्जा व्यापार को केवल व्यावसायिक सौदे के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि इसे व्यापक रणनीतिक संबंधों का हिस्सा माना जाता है। हालांकि आलोचकों का कहना है कि यदि चीन को रियायती तेल मिल रहा है और भारत को महंगा तेल खरीदना पड़ रहा है, तो इसका सीधा असर घरेलू पेट्रोल-डीजल कीमतों और महंगाई पर पड़ सकता है। सरकार का तर्क है कि भारत ने रूस से भी बड़ी मात्रा में रियायती तेल खरीदा है, जिससे लागत संतुलित हुई है। लेकिन वैश्विक दबावों के बीच हर सौदा आसान नहीं होता। ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना और साथ ही अंतरराष्ट्रीय संबंधों को संतुलित रखना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है।
आम उपभोक्ता पर असर और आगे की राह
तेल की कीमतों का असर सीधे आम नागरिक की जेब पर पड़ता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होता है, तो पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने का खतरा रहता है, जिससे परिवहन लागत और महंगाई बढ़ती है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह बड़ा मुद्दा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में भारत को ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने, नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर देने और दीर्घकालिक सस्ते अनुबंध करने की दिशा में और कदम उठाने होंगे। साथ ही, वैश्विक राजनीति में संतुलन बनाकर रखना भी जरूरी है। तेल बाजार में अमेरिका, रूस, ईरान और चीन जैसे देशों की रणनीतियां लगातार बदलती रहती हैं। ऐसे में भारत को हर कदम सोच-समझकर उठाना होगा। फिलहाल यह बहस तेज है कि क्या भारत को वास्तव में महंगा तेल खरीदना पड़ रहा है या यह व्यापक कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा है। आने वाले महीनों में वैश्विक तेल बाजार की दिशा और भारत की आयात नीति इस सवाल का जवाब साफ कर सकती है।
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