लखनऊ स्थित King George’s Medical University (KGMU) एक बार फिर सुर्खियों में है। लव जिहाद प्रकरण के दौरान चर्चा में आए कुलपति कार्यालय के ओएसडी रहे सैयद अब्बास के खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकार ने औपचारिक रूप से जांच समिति गठित कर दी है। यह फैसला तब लिया गया जब उनके खिलाफ गंभीर आरोपों को लेकर लगातार राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की ओर से सवाल उठाए जा रहे थे। आरोप है कि उन्होंने एक आरोपी डॉक्टर को बचाने की कोशिश की और विश्वविद्यालय परिसर में धार्मिक आयोजनों को बढ़ावा दिया। सरकार की ओर से गठित समिति अब पूरे मामले की तह तक जाएगी और यह पता लगाएगी कि नियुक्ति से लेकर प्रशासनिक फैसलों तक कहीं नियमों का उल्लंघन तो नहीं हुआ। इस कदम के बाद मेडिकल शिक्षा जगत में हलचल तेज हो गई है और केजीएमयू प्रशासन भी सतर्क नजर आ रहा है।
आरोपों की परतें: आरोपी डॉक्टर और धार्मिक आयोजन का विवाद
लव जिहाद प्रकरण के दौरान सामने आए आरोपों ने इस पूरे मामले को तूल दिया। सैयद अब्बास पर यह आरोप लगा कि उन्होंने एक ऐसे डॉक्टर को बचाने का प्रयास किया, जिस पर गंभीर आरोप दर्ज थे। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही होगी, लेकिन यह मुद्दा सोशल मीडिया से लेकर छात्र संगठनों तक चर्चा का विषय बना रहा। साथ ही कुछ धार्मिक संगठनों ने यह भी दावा किया कि केजीएमयू परिसर में धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे थे, जो एक शैक्षणिक संस्थान की मर्यादा के अनुरूप नहीं हैं। इन आरोपों ने विश्वविद्यालय की निष्पक्षता और प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए। विश्वविद्यालय प्रबंधन ने पहले इन आरोपों पर सीधे प्रतिक्रिया देने से परहेज किया, लेकिन विवाद बढ़ने के बाद आंतरिक स्तर पर समीक्षा शुरू की गई थी। अब सरकार की जांच समिति इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए दस्तावेज, नियुक्ति आदेश और संबंधित अधिकारियों के बयान दर्ज करेगी।
नियुक्ति प्रक्रिया पर उठे सवाल: संगठन ने खोला मोर्चा
इस पूरे मामले में एक और बड़ा मोड़ तब आया जब National Medicos Organisation (नेशनल मेडिकोज ऑर्गेनाइजेशन) ने सैयद अब्बास की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए। संगठन का आरोप था कि उन्हें कुलपति कार्यालय में नियमों के विरुद्ध तैनात किया गया। उनका कहना था कि नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी नहीं थी और आवश्यक औपचारिकताओं का पालन नहीं किया गया। संगठन ने इस मुद्दे को लेकर प्रशासन के सामने आपत्ति दर्ज कराई और कार्रवाई की मांग की। इसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने बिना अधिक प्रचार के सैयद अब्बास को उनके पद से हटा दिया। हालांकि उस समय इसे सामान्य प्रशासनिक बदलाव बताया गया, लेकिन अब सरकार द्वारा गठित जांच समिति ने इस फैसले को और अधिक गंभीर बना दिया है। जांच में यह देखा जाएगा कि क्या नियुक्ति वास्तव में नियमानुसार हुई थी या इसमें किसी प्रकार की अनियमितता थी।
सरकारी समिति की भूमिका: आगे क्या हो सकता है?
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बनाई गई जांच समिति को व्यापक अधिकार दिए गए हैं। समिति नियुक्ति प्रक्रिया, प्रशासनिक निर्णयों, आरोपी डॉक्टर से जुड़े प्रकरण और धार्मिक आयोजनों के आरोप—सभी पहलुओं की विस्तार से जांच करेगी। सूत्रों के अनुसार, समिति संबंधित दस्तावेजों की समीक्षा करने के साथ-साथ विश्वविद्यालय के अधिकारियों और कर्मचारियों से पूछताछ भी कर सकती है। यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता पाई जाती है, तो प्रशासनिक या कानूनी कार्रवाई भी संभव है। फिलहाल विश्वविद्यालय परिसर में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर चर्चा तेज है और छात्र-शिक्षक समुदाय आगे की कार्रवाई पर नजर बनाए हुए है। सरकार के इस कदम को पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अब सभी की निगाहें जांच समिति की रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और आगे क्या कदम उठाए जाएंगे।
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