उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के रानीगंज क्षेत्र के छींटपुर गांव में गुरुवार दोपहर एक अनोखा दृश्य देखने को मिला। एक बड़े ट्रक के पीछे-पीछे दो काले रंग की गाड़ियां गांव में दाखिल हुईं। जैसे ही ट्रक रुका, लोगों की भीड़ जमा हो गई और माहौल “जय गणेश” के जयकारों से गूंज उठा। ट्रक के भीतर था करीब 2000 किलोमीटर दूर अरुणाचल प्रदेश से आया एक विशालकाय हाथी—जिसका नाम है ‘जात्रा सिंह’। करीब पांच दिन की लंबी यात्रा के बाद जब यह हाथी गांव पहुंचा तो लोगों ने गाजे-बाजे के साथ उसका स्वागत किया। ट्रक से उतारते ही उस पर पुष्प वर्षा की गई। पहले दिन उसे आराम दिया गया, फिर अगले दिन नहलाकर मंदिर ले जाया गया, जहां विधि-विधान से पूजा हुई। गांव के बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक में इस हाथी को देखने की उत्सुकता साफ झलक रही थी। ग्रामीणों के लिए यह सिर्फ एक जानवर नहीं, बल्कि सम्मान और आस्था का प्रतीक बनकर आया है।
पिता के सम्मान से जुड़ी है ‘जात्रा सिंह’ की कहानी
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे एक भावनात्मक कहानी छिपी है। प्रतापगढ़ के निवासी और बीजेपी नेता अशोक त्रिपाठी के पिता स्वर्गीय राम प्रकाश त्रिपाठी अरुणाचल प्रदेश के विभिन्न जिलों में प्रधानाचार्य के पद पर तैनात रहे थे। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में लंबे समय तक सेवा दी। वर्ष 2023 में उनके निधन के बाद अरुणाचल प्रदेश के नामसाई शहर के लोगों ने उनकी स्मृति में उनकी पत्नी केवल देवी को ‘जात्रा सिंह’ नाम का यह हाथी सम्मान स्वरूप भेंट किया था। यह उपहार केवल एक प्रतीक नहीं था, बल्कि वहां के लोगों की श्रद्धा और आभार का प्रतीक था। हाथी की देखभाल के लिए अशोक त्रिपाठी ने अरुणाचल प्रदेश में दो अनुभवी महावतों की व्यवस्था की और उसके रहने-खाने का पूरा इंतजाम किया। लगभग दो वर्षों तक हाथी वहीं रहा, लेकिन मां की एक इच्छा ने इस कहानी को नया मोड़ दे दिया।
मां की इच्छा बनी वजह, डेढ़ साल बाद मिली अनुमति
करीब दो साल पहले अशोक त्रिपाठी की मां केवल देवी ने इच्छा जताई कि ‘जात्रा सिंह’ को उनके अपने गांव, प्रतापगढ़ लाया जाए। इसके बाद अक्टूबर 2024 में हाथी को लाने के लिए संबंधित विभागों में नियमानुसार आवेदन किया गया। हाथी जैसे वन्यजीव को एक राज्य से दूसरे राज्य में लाने के लिए कई कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। सभी जरूरी अनुमति और दस्तावेज पूरे करने में करीब डेढ़ साल का समय लग गया। आखिरकार 6 फरवरी 2026 को परिवहन की अनुमति मिल गई। दो दिन बाद हाथी को विशेष ट्रक में सुरक्षित तरीके से बिठाया गया और यात्रा शुरू हुई। असम, पश्चिम बंगाल और बिहार होते हुए 12 फरवरी को ‘जात्रा सिंह’ प्रतापगढ़ पहुंचा। इस पूरे सफर और व्यवस्थाओं पर करीब 1.5 लाख रुपये का खर्च आया। अशोक त्रिपाठी ने बताया कि मां की खुशी उनके लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता थी, इसलिए उन्होंने हर प्रक्रिया को नियमों के तहत पूरा किया।
कौन हैं अशोक त्रिपाठी? राजनीति और व्यवसाय से जुड़ा सफर
अशोक त्रिपाठी प्रतापगढ़ के एक प्रमुख व्यवसायी और सक्रिय राजनीतिक चेहरा हैं। उनका होटल व्यवसाय अरुणाचल प्रदेश और पश्चिम बंगाल तक फैला हुआ है। राजनीतिक सफर की बात करें तो उन्होंने पहले बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर 2017 में विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन सफलता नहीं मिली। 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन के उम्मीदवार के रूप में भी उन्होंने किस्मत आजमाई, मगर जीत हासिल नहीं कर पाए। 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने बीजेपी का दामन थाम लिया। फिलहाल वह बीजेपी से जुड़े हुए हैं और क्षेत्र में सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय रहते हैं। ‘जात्रा सिंह’ को गांव लाने की घटना ने उन्हें एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। गांव के लोग इसे परिवार की आस्था, सम्मान और मां की इच्छा पूरी करने की मिसाल के रूप में देख रहे हैं। प्रतापगढ़ में अब ‘जात्रा सिंह’ लोगों के आकर्षण का केंद्र बन गया है और दूर-दूर से लोग उसे देखने के लिए पहुंच रहे हैं।