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आखिर क्यों टलते रहे यूपी पंचायत चुनाव? हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा पूरा हिसाब, अब खुलेंगे देरी के राज!

यूपी पंचायत चुनाव में देरी को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने राज्य सरकार से पूरा रिकॉर्ड तलब किया है। अदालत ने पूछा कि कार्यकाल खत्म होने से पहले चुनाव क्यों नहीं कराए गए और भविष्य के लिए अहम टिप्पणी भी की।

इलाहाबाद हाईकोर्ट

उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव समय पर नहीं होने के मामले ने अब कानूनी मोड़ ले लिया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने चुनाव में हुई देरी को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार से पूरे मामले का रिकॉर्ड तलब किया है। अदालत जानना चाहती है कि पंचायतों का पांच साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले चुनाव क्यों नहीं कराए जा सके। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पंचायत चुनाव केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी है। इसलिए यह पता लगाना जरूरी है कि देरी किसी असाधारण परिस्थिति की वजह से हुई या फिर प्रशासनिक स्तर पर समय रहते जरूरी कदम नहीं उठाए गए। इस मामले की सुनवाई अब 11 अगस्त को होगी, जहां सरकार को अपने पक्ष में जरूरी दस्तावेज और रिकॉर्ड पेश करने होंगे।

 कोर्ट ने दी बड़ी सलाह, दो साल पहले शुरू होनी चाहिए तैयारी

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने भविष्य के लिए भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि पंचायत चुनाव कराने की पूरी प्रक्रिया कार्यकाल समाप्त होने से काफी पहले शुरू होनी चाहिए। कोर्ट की राय थी कि यदि तैयारी कम से कम दो वर्ष पहले शुरू कर दी जाए तो मतदाता सूची, आरक्षण और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं को समय पर पूरा किया जा सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 243-ई के अनुसार पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है और इस अवधि के समाप्त होने से पहले नई पंचायत का चुनाव कराना अनिवार्य है। यदि चुनाव समय पर नहीं होते हैं तो यह संवैधानिक व्यवस्था की भावना के विपरीत माना जा सकता है। इसलिए सरकार को भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने के लिए पहले से योजना बनानी चाहिए।

 चुनाव में देरी के पीछे क्या रहे कारण?

जानकारी के अनुसार इस बार पंचायत चुनाव पहले मई-जून में कराए जाने की संभावना थी, लेकिन कई प्रशासनिक प्रक्रियाएं समय पर पूरी नहीं हो सकीं। सबसे बड़ी वजह अंतिम मतदाता सूची का समय पर तैयार न होना रही। अंतिम वोटर लिस्ट जून में जारी की गई, जिससे चुनाव कार्यक्रम आगे बढ़ गया। इसके अलावा पिछड़ा वर्ग आरक्षण से जुड़ी प्रक्रिया भी लंबी चली। ओबीसी आयोग विभिन्न जिलों में सामाजिक और आर्थिक स्थिति का अध्ययन कर आरक्षण की सिफारिश तैयार कर रहा था। इन प्रक्रियाओं के पूरा होने में अपेक्षा से अधिक समय लगने के कारण चुनाव कार्यक्रम प्रभावित हुआ। अब हाईकोर्ट यह भी जांच करेगा कि क्या इन कारणों के बावजूद सरकार समय रहते वैकल्पिक व्यवस्था कर सकती थी या नहीं।

इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड भी जांचेगा कोर्ट

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी बताया कि उसने चुनाव प्रक्रिया से जुड़े कुछ इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड देखे हैं। अदालत ने निर्देश दिया है कि अगली तारीख पर ये रिकॉर्ड दोबारा प्रस्तुत किए जाएं, ताकि पूरी प्रक्रिया का क्रमवार परीक्षण किया जा सके। कोर्ट यह जानने की कोशिश करेगा कि जब चुनाव की तैयारी पहले शुरू होने की बात कही जा रही थी, तब भी तय समय के भीतर मतदान क्यों नहीं कराया जा सका। इस मामले का असर आने वाले पंचायत चुनावों की तैयारी और प्रशासनिक व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। यदि अदालत को किसी स्तर पर लापरवाही मिलती है तो संबंधित अधिकारियों से जवाब भी मांगा जा सकता है। फिलहाल सभी की नजर 11 अगस्त की सुनवाई पर टिकी है, जहां इस मामले में आगे की दिशा तय हो सकती है।

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