हिंदू पंचांग के अनुसार, बलराम जयंती हर साल भाद्रपद महीने के षष्ठी तिथि को मनाई जाती है, जो इस बार 17 अगस्त 2025 को पड़ रही है। यह तिथि रक्षाबंधन के 6 दिन बाद आती है और इसे हलछठ या ललई छठ के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म इसी दिन हुआ था। महिलाएं इस दिन विशेष रूप से संतान सुख, संतान की लंबी उम्र और परिवार की समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इसे खेत-खलिहान, हल और बैलों से जुड़े प्रतीकों के साथ जोड़कर भी पूजा की जाती है।
शुभ मुहूर्त और पूजा विधि
पंचांग के अनुसार, बलराम जयंती पर पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 08:05 से दोपहर 12:15 बजे तक रहेगा। इस दिन महिलाएं सुबह स्नान कर साफ-सुथरे वस्त्र पहनती हैं और मिट्टी के चबूतरे या पूजा स्थान पर बलराम जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करती हैं। हल, मूली, गन्ना, दूध, दही और फल का भोग लगाया जाता है। इस दिन हल से जोता हुआ अनाज या फल खाने की मनाही होती है। महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं और संध्या के समय व्रत कथा सुनकर पूजा संपन्न करती हैं।
नियम और धार्मिक मान्यता
हलछठ व्रत के नियम काफी सख्त माने जाते हैं। इस दिन हल से जुड़े किसी भी अनाज को नहीं खाया जाता, विशेषकर गेहूं और धान। पूजा के दौरान खेतों में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की भी प्रतीकात्मक पूजा की जाती है, ताकि कृषि कार्य में बाधा न आए और घर में अन्न-धान्य की भरपूरता बनी रहे। मान्यता है कि बलराम जयंती के दिन सच्चे मन से व्रत और पूजा करने से संतान प्राप्ति होती है और बच्चों की सेहत व आयु लंबी होती है।
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