मिडिल ईस्ट एक बार फिर युद्ध की आग में घिरता नजर आ रहा है। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर की गई सैन्य कार्रवाई को शुरुआत में एक सीमित ऑपरेशन बताया गया था। कहा गया कि यह कदम ईरान की सैन्य क्षमताओं को कमजोर करने और शासन पर दबाव बनाने के लिए उठाया गया। लेकिन हालात जल्द ही बदल गए। जैसे ही ईरान की ओर से जवाबी कार्रवाई के संकेत मिले, क्षेत्र में तनाव कई गुना बढ़ गया। मिसाइल अलर्ट, हवाई हमले और सैन्य गतिविधियों ने पूरे इलाके में बेचैनी फैला दी। विश्लेषकों का कहना है कि यह संघर्ष अब केवल तीन देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि करीब एक दर्जन देश किसी न किसी रूप में इसकी चपेट में आ चुके हैं। इसी वजह से इसे ‘12 देशों की जंग’ कहा जाने लगा है।
खामेनेई शासन की क्षेत्रीय रणनीति और बढ़ता दायरा
ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई के शासनकाल में देश ने मिडिल ईस्ट में अपने प्रभाव को लगातार मजबूत करने की कोशिश की। क्षेत्र के कई देशों में राजनीतिक और सामरिक संबंध बनाए गए, जिनमें लेबनान, यमन, इराक और सीरिया प्रमुख रहे। इन रिश्तों ने ईरान को रणनीतिक बढ़त दी, लेकिन साथ ही विरोधी देशों की चिंता भी बढ़ाई। जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान के ठिकानों को निशाना बनाया, तो यह केवल एक सैन्य हमला नहीं था, बल्कि उस पूरे नेटवर्क को चुनौती देने की कोशिश मानी गई। जवाब में ईरान से जुड़े गुटों की सक्रियता बढ़ने लगी। खाड़ी क्षेत्र के देशों—जैसे सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और कतर—ने अपनी सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी। इस बढ़ते सैन्य दबाव ने संघर्ष को कई सीमाओं तक फैला दिया।
मुस्लिम देशों की दुविधा और कूटनीतिक तनाव
इस संकट ने मुस्लिम दुनिया को असमंजस में डाल दिया है। कुछ देश अमेरिका और इजरायल के करीबी सहयोगी हैं, जबकि कुछ का झुकाव ईरान की ओर रहा है। ऐसे में खुलकर किसी एक पक्ष का समर्थन करना आसान नहीं है। क्षेत्रीय संगठनों के भीतर भी मतभेद सामने आ रहे हैं। कई देशों ने संयम और शांति की अपील की है, लेकिन जमीनी स्तर पर सैन्य तैयारियां जारी हैं। तेल निर्यात करने वाले देशों में खास सतर्कता है, क्योंकि किसी भी बड़े हमले से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात जल्दी नहीं सुधरे, तो यह टकराव और व्यापक रूप ले सकता है। कूटनीतिक प्रयास जारी हैं, लेकिन फिलहाल जमीन पर तनाव कम होता नहीं दिख रहा।
वैश्विक असर और भारत के लिए चुनौती
‘12 देशों की जंग’ का असर केवल मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव शुरू हो चुका है। कई एयरलाइंस ने अपने उड़ान मार्ग बदले हैं और कुछ क्षेत्रों के लिए यात्रा सलाह जारी की गई है। भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से संवेदनशील है, क्योंकि खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं। किसी भी बड़े संघर्ष से उनकी सुरक्षा और रोज़गार प्रभावित हो सकता है। इसके अलावा भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। यदि युद्ध लंबा चला, तो महंगाई और आर्थिक दबाव बढ़ सकता है। फिलहाल दुनिया की नजर इस पर है कि क्या बातचीत और कूटनीति इस संकट को रोक पाएगी या यह संघर्ष और बड़े स्तर पर फैल जाएगा।
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