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अटलांटिक में रूसी तेल टैंकर पर कब्जा US नेवी ने किया कब्जा, अमेरिका-रूस आमने-सामने

वेनेजुएला से आ रहे रूसी झंडे वाले तेल टैंकर बेला-1 को अमेरिका ने अटलांटिक महासागर में जब्त किया। पास में रूसी पनडुब्बी और युद्धपोत दिखने से अमेरिका-रूस तनाव तेज हो गया है।

उत्तरी अटलांटिक महासागर में उस वक्त हालात बेहद संवेदनशील हो गए, जब अमेरिकी नौसेना और कोस्ट गार्ड ने वेनेजुएला से जुड़े एक तेल टैंकर पर कब्जा कर लिया। इस टैंकर का नाम बेला-1 बताया जा रहा है, जो हाल के महीनों में अमेरिकी एजेंसियों की नजर में था। अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग के अनुसार, यह कार्रवाई किसी एक दिन की योजना नहीं थी, बल्कि पिछले करीब दो हफ्तों से इस टैंकर का पीछा किया जा रहा था। अमेरिका का दावा है कि यह जहाज वेनेजुएला से तेल लेकर प्रतिबंधों को तोड़ते हुए अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में आवाजाही कर रहा था। जैसे ही अमेरिकी बलों ने इसे रोका, यह साफ हो गया कि मामला सिर्फ तेल तस्करी तक सीमित नहीं है। जिस इलाके में यह टैंकर पकड़ा गया, वहीं रूसी पनडुब्बी और एक वॉरशिप की मौजूदगी ने हालात को और तनावपूर्ण बना दिया। इस पूरे ऑपरेशन का वीडियो अमेरिकी होम डिपार्टमेंट की ओर से सार्वजनिक किया गया, जिसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल तेज हो गई।

टैंकर की पहचान, पीछा और अमेरिकी दावा

अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, बेला-1 नाम का यह टैंकर पहले वेनेजुएला के आसपास देखा गया था और उसने अमेरिकी कोस्ट गार्ड को चकमा देकर वहां से भागने की कोशिश की थी। पिछले महीने जब पहली बार अमेरिकी तटरक्षक बल ने इसे रोकने का प्रयास किया, तब जहाज ने बोर्डिंग से इनकार कर दिया और दिशा बदलकर निकल गया। इसके बाद अमेरिका ने हार नहीं मानी और अटलांटिक महासागर में इसका पीछा जारी रखा। निगरानी के लिए इंग्लैंड के सफोक स्थित आरएएफ मिल्डेनहॉल बेस से अमेरिकी पी-8 निगरानी विमान तैनात किए गए। अमेरिकी यूरोपीय कमान ने बयान जारी कर कहा कि प्रतिबंधों के उल्लंघन के कारण इस टैंकर को जब्त किया गया है। यह गृह सुरक्षा विभाग और अमेरिकी सैन्य बलों का संयुक्त अभियान था। अमेरिका का कहना है कि यह टैंकर तथाकथित ‘शैडो फ्लीट’ का हिस्सा है, जिनका इस्तेमाल प्रतिबंधित देशों से अवैध रूप से तेल ढोने के लिए किया जाता है। इसी वजह से 2024 में ही इस पोत पर अमेरिकी प्रतिबंध लगाए गए थे।

रूसी झंडा, नाम बदला और मास्को की चेतावनी

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया, जब टैंकर के चालक दल ने खुद को रूसी संरक्षण में बताया। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, पीछा तेज होने के बाद जहाज पर रूसी झंडा बना दिया गया और दावा किया गया कि यह रूसी ध्वज के तहत संचालित हो रहा है। इसके कुछ ही समय बाद यह टैंकर रूस के आधिकारिक जहाज रजिस्टर में एक नए नाम ‘मेरिनेरा’ के तहत दर्ज हो गया। रूस ने भी इस पर कड़ा रुख अपनाया और पिछले महीने अमेरिका को चेतावनी दी थी कि वह इस पोत का पीछा करना बंद करे। मास्को का तर्क था कि यह जहाज रूसी संरक्षण में है और उस पर कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन होगी। हालांकि अमेरिका ने इस चेतावनी को नजरअंदाज करते हुए अपना ऑपरेशन जारी रखा। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि नाम बदलने या झंडा लगाने से प्रतिबंधों की सच्चाई नहीं बदल जाती। यही वजह है कि इस कार्रवाई को अमेरिका ने कानूनी और जरूरी कदम बताया है।

ब्रिटेन की चुप्पी और आगे क्या संकेत?

इस पूरे मामले पर ब्रिटेन ने फिलहाल कोई सीधी प्रतिक्रिया देने से इनकार किया है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के आधिकारिक प्रवक्ता ने कहा कि ब्रिटेन अन्य देशों की सैन्य या परिचालन गतिविधियों पर टिप्पणी नहीं करता और यह सरकार का लंबे समय से चला आ रहा रुख है। हालांकि जानकार मानते हैं कि अटलांटिक में जिस तरह से अमेरिकी कार्रवाई के दौरान रूसी पनडुब्बी और वॉरशिप की मौजूदगी सामने आई है, वह आने वाले समय में बड़े टकराव का संकेत हो सकती है। यह घटना सिर्फ एक तेल टैंकर की जब्ती नहीं, बल्कि अमेरिका और रूस के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव की झलक भी मानी जा रही है। वेनेजुएला, प्रतिबंध, शैडो फ्लीट और समुद्री सैन्य ताकत—ये सभी पहलू मिलकर इस मामले को बेहद संवेदनशील बना रहे हैं। अब सबकी नजर इस पर टिकी है कि रूस इस कार्रवाई पर आगे क्या कदम उठाता है और क्या यह घटना अमेरिका-रूस संबंधों में एक और कड़वाहट जोड़ने वाली साबित होगी।

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