सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में साफ कर दिया है कि गोद लेने वाली महिलाओं को भी मातृत्व अवकाश (मेटरनिटी लीव) का पूरा अधिकार है, चाहे बच्चा तीन महीने से अधिक उम्र का ही क्यों न हो। अदालत ने कहा कि मातृत्व सिर्फ जैविक प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक भावनात्मक और सामाजिक जिम्मेदारी भी है। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि किसी महिला को केवल इसलिए मातृत्व लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि उसने बच्चे को जन्म नहीं दिया है, बल्कि गोद लिया है।
कानून की उस शर्त पर लगी रोक
सुनवाई के दौरान अदालत ने सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 की धारा 60(4) पर भी टिप्पणी की, जिसमें केवल तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेने पर ही मातृत्व अवकाश का प्रावधान था। कोर्ट ने इस सीमा को मनमाना और भेदभावपूर्ण करार देते हुए इसे संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन बताया। न्यायालय का कहना था कि यह प्रावधान गोद लेने वाली माताओं के साथ अन्याय करता है और बच्चों के हितों के भी खिलाफ है।
याचिका से फैसले तक का सफर
यह मामला एक याचिका के जरिए अदालत तक पहुंचा था, जिसमें गोद लेने वाली मांओं को मिलने वाले सीमित अवकाश को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि कानून जैविक और गोद लेने वाली मांओं के बीच भेदभाव करता है, जो पूरी तरह अनुचित है। अदालत ने इस तर्क को गंभीरता से लिया और विस्तृत सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया। इस दौरान न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि परिवार बनाने के गैर-जैविक तरीके भी उतने ही मान्य और सम्मानजनक हैं जितने जैविक तरीके।
महिलाओं को बड़ी राहत, सरकार को सुझाव
इस फैसले के बाद देशभर में कामकाजी महिलाओं के लिए राहत की खबर है, खासकर उन महिलाओं के लिए जो बच्चे गोद लेने के बाद अपने करियर और परिवार के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती हैं। कोर्ट ने केंद्र सरकार से पितृत्व अवकाश (पैटरनिटी लीव) की नीति पर भी विचार करने की सलाह दी है, ताकि परिवार में दोनों अभिभावकों की जिम्मेदारी को समान रूप से मान्यता मिल सके। इस फैसले को महिलाओं के अधिकारों की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, जो समाज में समानता और न्याय को मजबूत करेगा
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