मुस्लिम पुरुषों को एक से अधिक विवाह की अनुमति देने वाले प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। इस मामले ने एक बार फिर देश में समानता, महिला अधिकार और पर्सनल लॉ को लेकर नई बहस छेड़ दी है। याचिका में मांग की गई है कि पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी को कानूनी रूप से अमान्य घोषित किया जाए और इसे दंडनीय अपराध बनाया जाए। इसके अलावा विवाह, तलाक, भरण-पोषण और उत्तराधिकार जैसे मामलों में सभी नागरिकों के लिए समान और जेंडर न्यूट्रल कानून लागू करने की भी मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर उसका पक्ष मांगा है। सरकार का जवाब मिलने के बाद मामले की अगली सुनवाई होगी।
याचिका में किन कानूनी प्रावधानों पर उठाए गए सवाल?
महिला अधिकार कार्यकर्ताओं की ओर से दायर इस याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीअत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 की धारा 2 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह प्रावधान मुस्लिम समुदाय में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, भरण-पोषण और वक्फ जैसे मामलों में पर्सनल लॉ लागू करता है। उनका तर्क है कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 82 के तहत एक से अधिक विवाह को अपराध माना गया है, लेकिन मुस्लिम पुरुषों को इससे अलग रखा गया है। याचिका के अनुसार यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (भेदभाव पर रोक) और अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार) की भावना के अनुरूप नहीं है। इसलिए सभी नागरिकों के लिए समान कानूनी व्यवस्था लागू की जानी चाहिए।
धार्मिक स्वतंत्रता और महिला अधिकारों पर क्या दलील दी गई?
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा है कि बहुविवाह को अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं माना जा सकता। उनका कहना है कि इतिहास में कुछ विशेष परिस्थितियों में इसकी अनुमति दी गई थी, लेकिन इसके साथ सभी पत्नियों और बच्चों के साथ समान व्यवहार की शर्त भी जुड़ी थी। याचिका में यह भी कहा गया है कि आधुनिक समय में कई मुस्लिम बहुल देशों ने बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाया है या उसे कड़े नियमों के दायरे में रखा है। इसलिए भारत में भी महिला अधिकारों और समानता को ध्यान में रखते हुए कानून की समीक्षा की जानी चाहिए। याचिका में विवाह और तलाक का अनिवार्य पंजीकरण तथा न्यायसंगत मुस्लिम पर्सनल लॉ तैयार करने की मांग भी शामिल है।
सर्वे का हवाला देकर रखी गई नई मांग, अब केंद्र के जवाब पर नजर
याचिका में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (BMMA) के एक सर्वे का भी उल्लेख किया गया है। इसमें दावा किया गया है कि बड़ी संख्या में दूसरी शादियां पहली पत्नी की जानकारी या सहमति के बिना होती हैं। सर्वे के आधार पर यह भी कहा गया कि कई महिलाओं ने बहुविवाह पर पूर्ण कानूनी रोक की मांग की है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ऐसी स्थिति महिलाओं के अधिकारों और सम्मान को प्रभावित करती है। अब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस पूरे मामले पर जवाब मांगा है। सरकार का पक्ष सामने आने के बाद अदालत तय करेगी कि इस संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय पर आगे क्या दिशा तय की जाए।
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