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लोकसभा में महिला आरक्षण बिल क्यों नहीं पास करा पाई मोदी सरकार? जाने कहां फंसा पेंच

लोकसभा में महिला आरक्षण बिल को लेकर बड़ा सियासी विवाद सामने आया। जानिए क्यों बिगड़ा गणित, क्या है परिसीमन की शर्त और क्यों उलझा पूरा मामला।

Women Reservation Bill 2026

Women Reservation Bill 2026: लोकसभा में महिला आरक्षण यानी ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को लेकर जबरदस्त राजनीतिक हलचल देखने को मिली। चर्चा के दौरान ऐसा माहौल बना जैसे सरकार के सामने सबसे बड़ा संवैधानिक टेस्ट आ गया हो। हालांकि यहां एक अहम तथ्य समझना जरूरी है कि यह बिल पूरी तरह गिरा नहीं, बल्कि यह एक ऐसा संशोधन प्रस्ताव था जिसे पारित करने के लिए बेहद कठिन संवैधानिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। दरअसल, यह बिल सीधे साधारण बहुमत से नहीं, बल्कि संविधान संशोधन के कारण दो-तिहाई बहुमत और राज्यों की मंजूरी जैसी शर्तों से जुड़ा होता है। इसी जटिल गणित के कारण संसद में इसे लेकर राजनीतिक समीकरण उलझते नजर आए और बहस ने सियासी तनाव का रूप ले लिया।

दो-तिहाई बहुमत का गणित और NDA की असली चुनौती

संविधान संशोधन बिलों को पास कराने के लिए लोकसभा और राज्यसभा दोनों में विशेष बहुमत यानी दो-तिहाई वोटों की जरूरत होती है। यह साधारण बहुमत से कहीं ज्यादा कठिन प्रक्रिया होती है। NDA के पास भले ही सरकार चलाने लायक बहुमत मौजूद हो, लेकिन इस विशेष आंकड़े को अकेले हासिल करना आसान नहीं होता। ऐसे में सरकार को विपक्ष के समर्थन की जरूरत पड़ती है। इसी जगह पर गणित बिगड़ता हुआ नजर आया। विपक्षी दलों ने कई शर्तों और राजनीतिक आशंकाओं के चलते बिल के समर्थन में एकजुट रुख नहीं अपनाया। नतीजा यह हुआ कि सहमति का जो माहौल बनना चाहिए था, वह बहस और आरोप-प्रत्यारोप में बदल गया।

परिसीमन और जनगणना की शर्त ने बढ़ाया विवाद

इस बिल से जुड़ा सबसे बड़ा विवाद ‘परिसीमन’ और ‘जनगणना’ की शर्तों को लेकर सामने आया। प्रस्ताव में यह स्पष्ट किया गया है कि महिला आरक्षण तभी लागू होगा जब अगली जनगणना और उसके आधार पर सीटों का परिसीमन पूरा होगा। विपक्षी दलों ने इसी बिंदु पर सवाल उठाते हुए सरकार पर देरी करने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि इसे तुरंत लागू किया जा सकता है, लेकिन प्रक्रिया को भविष्य की जनगणना से जोड़कर इसे टालने की कोशिश की जा रही है। वहीं कई क्षेत्रीय दलों को डर है कि परिसीमन होने पर लोकसभा सीटों का संतुलन बदल सकता है, जिससे उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक शक्ति असंतुलित हो सकता है। खासकर दक्षिणी राज्यों ने अपनी जनसंख्या वृद्धि दर के आधार पर सीटों में संभावित कमी को लेकर चिंता जताई।

 सियासी खींचतान की असली जड़

महिला आरक्षण बिल पर एक और बड़ा विवाद ‘कोटा के भीतर कोटा’ की मांग को लेकर सामने आया। कुछ विपक्षी दलों ने मांग की कि 33% महिला आरक्षण में अलग से ओबीसी और मुस्लिम महिलाओं के लिए उप-आरक्षण तय किया जाए। सरकार ने इस पर साफ रुख अपनाते हुए कहा कि धर्म के आधार पर आरक्षण का प्रावधान संविधान में नहीं है। वहीं ओबीसी आरक्षण को लेकर भी अलग प्रावधान की मांग पर सहमति नहीं बनी। इसी दौरान सियासत ने एक नया मोड़ लिया, जहां इसे उत्तर बनाम दक्षिण और जातीय प्रतिनिधित्व की बहस के रूप में भी देखा जाने लगा। कुल मिलाकर यह बिल केवल महिला सशक्तिकरण का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि भारतीय राजनीति के कई जटिल समीकरणों का केंद्र बन गया।

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