उत्तर प्रदेश की राजनीति इन दिनों एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ी है जहाँ हर एक बयान और हर एक कदम आने वाले विधानसभा चुनावों की बिसात को पूरी तरह बदलने की ताकत रखता है। हाल ही में केंद्र सरकार में शिक्षा मंत्री रहे धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे ने दिल्ली से लेकर लखनऊ तक की सियासत में भूचाल ला दिया है। विपक्षी दल—विशेषकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस—इसे अपनी बहुत बड़ी नैतिक जीत मानकर गदगद हैं और युवाओं के बीच जाकर इसका पूरा राजनीतिक श्रेय लेने की होड़ में लगे हैं। सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव के नेतृत्व में पार्टी इसे आगामी चुनावों में एक बड़ा हथियार बनाने की फिराक में थी, ताकि युवाओं और छात्रों के असंतोष को अपने पाले में खींचा जा सके। लेकिन, इस पूरे घटनाक्रम में तब एक नाटकीय मोड़ आ गया जब बीजेपी के सहयोगी दलों ने इस मामले को पूरी तरह से एक अलग सामाजिक और राजनीतिक दिशा में मोड़ दिया। अब सियासी गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि जो इस्तीफा विपक्ष के लिए संजीवनी बूटी लग रहा था, वह कहीं उल्टा उन्हीं के गले की फांस न बन जाए।
बीजेपी और सहयोगियों का मास्टरस्ट्रोक: क्या पिछड़ों के अपमान पर घिर जाएगी सपा?
इस पूरे राजनीतिक ड्रामे का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि भारतीय जनता पार्टी ने इस मामले में डिफेंसिव यानी बचाव की मुद्रा अपनाने के बजाय आक्रामक और रणनीतिक रुख अपनाया है। बीजेपी के बजाय अब उसके प्रमुख सहयोगी दल इस पिच पर खुलकर बैटिंग कर रहे हैं। निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और योगी सरकार में मंत्री संजय निषाद ने एक तीखा बयान देते हुए सीधे तौर पर समाजवादी पार्टी पर बड़ा हमला बोला है। संजय निषाद का साफ कहना है कि अखिलेश यादव और विपक्ष का असली मकसद कभी भी पेपर लीक या छात्र हित का नहीं था, बल्कि उनका मुख्य उद्देश्य केंद्र सरकार में एक पिछड़े वर्ग के कद्दावर नेता को शिक्षा मंत्री के पद से हटवाना था। उन्होंने यहां तक आरोप लगाया कि विपक्ष के लोग नहीं चाहते हैं कि देश की शिक्षा व्यवस्था या कोई बड़ा पद किसी पिछड़े वर्ग के बेटे के पास रहे। इसके साथ ही, सुभासपा विधायक बेदीराम ने भी इस मामले में अपनी बात रखते हुए विपक्ष पर निशाना साधा और कहा कि दलित होने के कारण उन्हें और उनकी पार्टी को जानबूझकर टारगेट किया जा रहा है। बीजेपी के इन सहयोगियों द्वारा इस मुद्दे को ‘पिछड़े और दलित वर्ग के नेता के खिलाफ साजिश’ के रूप में पेश करने से पूरा सियासी नैरेटिव ही बदलता हुआ नजर आ रहा है।
सपा का PDA फॉर्मूला और विपक्ष के सामने खड़ी हुई अनूठी दुविधा
उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों को जीतने के लिए समाजवादी पार्टी इस समय अपने सबसे अचूक हथियार यानी PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले पर पूरी ताकत से काम कर रही है। लोकसभा चुनावों में इस रणनीति ने पार्टी को शानदार सफलता दिलाई थी, और पार्टी इसी फॉर्मूले को विधानसभा चुनाव में भी भुनाने की तैयारी में थी। लेकिन धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर बीजेपी के सहयोगियों द्वारा इसे ‘पिछड़ा विरोधी’ रंग दिए जाने के बाद सपा और कांग्रेस के रणनीतिकार गहरे असमंजस में पड़ गए हैं। सपा प्रवक्ता फखरुल हसन चांद और अन्य विपक्षी नेता भले ही यह दलील दे रहे हैं कि यह लड़ाई किसी जाति या व्यक्ति की नहीं बल्कि लाखों छात्रों के भविष्य और नाकामी की थी, लेकिन चुनावी जमीन पर इस बात को आम जनता और युवाओं के बीच समझाना आसान नहीं होगा। यदि विपक्षी दल इस मुद्दे को बहुत ज्यादा तूल देते हैं, तो सत्ता पक्ष इसे पिछड़ों के अपमान से जोड़कर सपा के उस PDA समीकरण में ही सेंध लगा सकता है, जिसे पार्टी अपनी सबसे बड़ी ताकत मानती है। दूसरी तरफ, अगर विपक्ष इस मुद्दे से पीछे हटता है तो युवाओं के बीच यह संदेश जाएगा कि वे इस बड़े आंदोलन को भुनाने के बाद बीच में ही छोड़ गए।
अब आगे क्या होगा? चुनावी पिच पर बदल रहे हैं समीकरण और रणनीतिक तेवर
कुल मिलाकर देखा जाए तो धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक ऐसा केंद्र बिंदु बन गया है जहाँ से हर राजनीतिक दल अपनी-अपनी सुविधानुसार गोटियां फिट करने में जुटा है। एक तरफ AIMIM जैसे दल और तमाम छात्र संगठन इसे छात्रों के कड़े संघर्ष और अहंकार पर जीत का प्रतीक बता रहे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ मुख्य विपक्षी दल इस बात को लेकर उलझन में हैं कि इस धारदार हथियार को कैसे संभाला जाए ताकि खुद उनका राजनीतिक नुकसान न हो। आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प और महत्वपूर्ण होगा कि क्या खुद भारतीय जनता पार्टी खुलकर इस ‘पिछड़ा और दलित अस्मिता’ वाले नैरेटिव की कमान अपने हाथों में लेती है, या फिर वह अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के कंधों पर ही बंदूक रखकर विपक्ष को चारों खाने चित करती रहती है। फिलहाल, यूपी की सियासी जमीन पर इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि चुनाव भले ही अभी दूर हों, लेकिन उसकी बिसात पर मोहरों की चाल अभी से बहुत तेजी से बदली जा रही है, और हर एक इस्तीफा या बयान किसी भी वक्त सियासी पासा पलटने का दम रखता है।
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