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वारंट किसी और का था, जेल चला गया UP का सिपाही! 166 दिन जेल में गुजारने के बाद ऐसे खुला राज

राजस्थान पुलिस ने 1998 में मर चुके व्यक्ति के नाम वाले लखनऊ के सिपाही को गिरफ्तार कर लिया। जानिए कैसे 166 दिन जेल में रहने के बाद हाई कोर्ट से मिली राहत।

राजस्थान

राजस्थान पुलिस की एक बड़ी चूक का मामला सामने आया है। 1998 में जिस व्यक्ति की मौत हो चुकी थी, उसके खिलाफ जारी गिरफ्तारी वारंट के आधार पर लखनऊ में तैनात एक सिपाही को पकड़ लिया गया। करीब 166 दिन जेल में रहने के बाद हाई कोर्ट से राहत मिली। अब सिपाही का कहना है कि जेल से बाहर आने के बाद भी उसे ड्यूटी जॉइन करने में परेशानी हो रही है।

एक ही नाम ने पैदा कर दी बड़ी मुसीबत

मामला राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले के गंगापुर सिटी सदर थाना क्षेत्र से जुड़ा है। पुलिस ने 15 फरवरी 2026 को लखनऊ के गोमतीनगर निवासी सिपाही अखिलेश त्रिपाठी को गिरफ्तार किया था। बताया गया कि गिरफ्तारी एक पुराने धोखाधड़ी के मामले में जारी स्थायी वारंट के आधार पर हुई। खास बात यह थी कि वारंट जिस अखिलेश त्रिपाठी के खिलाफ था, उसकी मौत 17 सितंबर 1998 को ही हो चुकी थी। इसके बावजूद नाम की समानता के आधार पर लखनऊ में तैनात सिपाही को आरोपी समझ लिया गया। रिकॉर्ड में दोनों की पहचान से जुड़ी दूसरी जानकारियां अलग थीं।

पिता का नाम भी अलग, फिर भी भेज दिया जेल

जिस व्यक्ति के खिलाफ मूल मामला दर्ज था, वह लखनऊ के अलीगंज इलाके से जुड़ा बताया गया था और उसका मूल निवास देवरिया था। उसने अलीगंज के पते पर एक फर्म भी दर्ज कराई थी, जिसके जरिए धोखाधड़ी का मामला सामने आया था। वारंट में आरोपी के पिता का नाम विश्वनाथ दर्ज था, जबकि गिरफ्तार सिपाही की पारिवारिक पहचान अलग थी। सिपाही के अनुसार, उसने गिरफ्तारी के समय ही पुलिस को बताया था कि वह गलत व्यक्ति है और उसका इस पुराने मामले से कोई संबंध नहीं है। इसके बावजूद उसकी बात पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया और 16 फरवरी को उसे जेल भेज दिया गया।

166 दिन जेल में रहने के बाद हाई कोर्ट से मिली राहत

गिरफ्तारी के बाद सिपाही को करीब 166 दिन जेल में रहना पड़ा। बाद में मामले को लेकर हाई कोर्ट की जयपुर पीठ में याचिका दाखिल की गई। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य रखा गया कि गिरफ्तारी वारंट में दर्ज व्यक्ति और गिरफ्तार सिपाही एक नहीं हैं। इसके बाद पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठे। सुनवाई के दौरान सवाई माधोपुर की पुलिस अधीक्षक ज्येष्ठा मैत्रेयी भी अदालत में पेश हुईं। पुलिस ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए माफी मांगी। अदालत ने पहचान की पुष्टि किए बिना गिरफ्तारी करने पर गंभीर चिंता जताई और भविष्य में ऐसे मामलों में दस्तावेज और पहचान की पूरी जांच करने की बात कही।

जेल से बाहर आए, अब नौकरी जॉइन करने में भी अड़चन

सिपाही को 1 अगस्त को जेल से रिहा किया गया। इसके बाद वह लखनऊ लौटे और ड्यूटी पर वापस आने के लिए अपने कमांडेंट से संपर्क किया। उनका दावा है कि उन्हें जॉइनिंग नहीं दी गई। इसके बाद उन्होंने डीआईजी से भी संपर्क किया, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ। सिपाही के पास हाई कोर्ट के आदेश और मामले से जुड़े दस्तावेज मौजूद हैं। अब उनका कहना है कि राजस्थान पुलिस की पहचान संबंधी गलती का असर उनकी नौकरी पर भी पड़ रहा है। मामला यह सवाल भी खड़ा करता है कि गिरफ्तारी से पहले पुलिस ने आरोपी की पहचान और रिकॉर्ड का मिलान किस स्तर पर किया था।

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