तमिलनाडु के करूर भगदड़ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने मुख्यमंत्री विजय को पीड़ित परिवारों से मिलने, मुआवजा देने और नौकरी के नियुक्ति पत्र बांटने से रोकने की मांग वाली डीएमके की याचिका खारिज कर दी। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि वह किसी मुख्यमंत्री के कामकाज या उनकी गतिविधियों को तय नहीं कर सकता। अदालत ने यह भी कहा कि राजनीतिक मतभेदों का समाधान अदालत में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक और राजनीतिक मंचों पर होना चाहिए। कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद डीएमके की मांग को कोई राहत नहीं मिली।
कोर्ट ने राजनीति को अदालत से दूर रखने की दी सलाह
सुनवाई के दौरान जजों ने डीएमके के वकील से कहा कि अदालत को राजनीतिक विवाद का मंच नहीं बनाया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी राजनीतिक दल या सरकार की ओर से कोई बयान दिया जाता है, तो विपक्ष उसके जवाब में अपनी बात रख सकता है। इसके लिए अदालत का इस्तेमाल करना उचित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुख्यमंत्री का पीड़ित परिवारों से मिलना या उन्हें सहायता देना प्रशासनिक और राजनीतिक निर्णय का हिस्सा है। ऐसे मामलों में अदालत तभी हस्तक्षेप करेगी, जब कानून का स्पष्ट उल्लंघन दिखाई दे।
क्या है करूर भगदड़ का मामला?
यह मामला पिछले साल सितंबर में करूर में हुई एक बड़ी भगदड़ से जुड़ा है। उस समय तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) की एक रैली के दौरान अचानक भगदड़ मच गई थी। इस दर्दनाक हादसे में 41 लोगों की जान चली गई थी और कई लोग घायल हुए थे। घटना के बाद जांच पहले विशेष जांच दल (SIT) को सौंपी गई थी, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच राज्य पुलिस से लेकर सीबीआई को सौंप दी। फिलहाल इस मामले की जांच जारी है और कोर्ट की निगरानी में एक समिति भी पूरी प्रक्रिया पर नजर रख रही है, ताकि जांच निष्पक्ष तरीके से पूरी हो सके।
पीड़ित परिवारों को सहायता देंगे मुख्यमंत्री विजय
मुख्यमंत्री विजय जल्द ही करूर जाकर हादसे में जान गंवाने वाले लोगों के परिवारों से मुलाकात करेंगे। उन्होंने प्रत्येक मृतक के परिवार को 10-10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता और एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का ऐलान किया है। डीएमके का आरोप था कि इससे जांच प्रभावित हो सकती है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत के फैसले के बाद अब मुख्यमंत्री के करूर दौरे का रास्ता साफ हो गया है। माना जा रहा है कि इस फैसले का तमिलनाडु की राजनीति पर भी असर पड़ सकता है, लेकिन फिलहाल पीड़ित परिवारों को मिलने वाली राहत और सहायता पर सभी की नजर बनी हुई है।
