US Iran Talks: अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव को कम करने के लिए हुई शांति वार्ता आखिरकार बिना किसी समझौते के खत्म हो गई। इस असफलता के बाद दोनों देशों ने एक-दूसरे पर आरोप लगाना शुरू कर दिया है। ईरान की सरकारी मीडिया ने दावा किया कि बातचीत इसलिए आगे नहीं बढ़ सकी क्योंकि अमेरिका ने जरूरत से ज्यादा शर्तें रख दीं। वहीं अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance ने कहा कि बातचीत गंभीर और उपयोगी थी, लेकिन कोई साझा समझौता नहीं हो सका। उन्होंने यह भी जोड़ा कि इस असफलता का नुकसान अमेरिका से ज्यादा ईरान को हो सकता है। इस बयान के बाद दोनों देशों के बीच जुबानी जंग और तेज हो गई है।
किस मुद्दे पर अटक गई पूरी बातचीत?
इस पूरी वार्ता में सबसे बड़ा विवाद ईरान के परमाणु कार्यक्रम और रणनीतिक अधिकारों को लेकर सामने आया। अमेरिका चाहता था कि ईरान स्पष्ट रूप से यह भरोसा दे कि वह कभी परमाणु हथियार नहीं बनाएगा और ऐसी कोई तकनीक भी विकसित नहीं करेगा जिससे जल्दी हथियार तैयार हो सकें। दूसरी तरफ, ईरान का कहना है कि शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा के लिए यूरेनियम संवर्धन उसका अधिकार है और वह इस पर कोई समझौता नहीं करेगा। इसके अलावा Strait of Hormuz को लेकर भी बड़ा मतभेद रहा, जहां ईरान अपने नियंत्रण और ट्रांजिट शुल्क के अधिकार को मान्यता दिलाना चाहता है। इन मुद्दों पर कोई बीच का रास्ता नहीं निकल पाया, जिससे पूरी बातचीत ठप हो गई।
ईरान का बड़ा आरोप—‘जंग में जो न मिला, अब मांग रहे’
ईरान के करीबी सूत्रों ने अमेरिकी रवैये पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि अमेरिका ने बातचीत के दौरान ऐसी मांगें रखीं जो उसे युद्ध के दौरान भी हासिल नहीं हो सकीं। ईरानी पक्ष के मुताबिक, अमेरिका ने न्यूक्लियर प्रोग्राम, क्षेत्रीय प्रभाव और समुद्री मार्गों पर नियंत्रण जैसे मुद्दों पर सख्त शर्तें रखीं, जिन्हें स्वीकार करना ईरान के लिए संभव नहीं था। ईरान ने अपनी 10 सूत्रीय शर्तों में साफ कहा था कि उसे अपने परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज जलडमरूमध्य पर अधिकार से समझौता नहीं करना है। यही कारण रहा कि दोनों देशों के बीच सहमति की कोई जमीन नहीं बन सकी।
बढ़ेगा तनाव या फिर शुरू होगी नई बातचीत?
वार्ता के असफल होने के बाद भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। JD Vance ने संकेत दिया कि बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं और अमेरिका ने अपना अंतिम प्रस्ताव ईरान के सामने रख दिया है। अब यह ईरान पर निर्भर करता है कि वह आगे कैसे बढ़ता है। हालांकि, मौजूदा हालात को देखते हुए यह साफ है कि दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी और रणनीतिक मतभेद बहुत गहरे हैं। अगर जल्द कोई समाधान नहीं निकला, तो यह विवाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई अस्थिरता पैदा कर सकता है और वैश्विक स्तर पर इसके असर देखने को मिल सकते हैं।
