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पाकिस्तान में आखिर किसने सेना प्रमुख को खुली चुनौती दे दी? मंच से कहा- ‘हिम्मत है तो…’

जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने सेना प्रमुख आसिम मुनीर पर निशाना साधते हुए कहा कि राजनीति करनी है तो चुनाव लड़ें। जानिए उनके बयान से पाकिस्तान में क्यों मचा राजनीतिक विवाद।

मौलाना फजलुर रहमान

पाकिस्तान की राजनीति में एक बार फिर सेना की भूमिका को लेकर बहस तेज हो गई है। देश के प्रमुख धार्मिक और राजनीतिक नेता मौलाना फजलुर रहमान ने सार्वजनिक मंच से सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर पर निशाना साधते हुए कई तीखे सवाल उठाए हैं। पंजाब प्रांत के कसूर में आयोजित एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि देश के हर संस्थान को अपने संवैधानिक अधिकार क्षेत्र के भीतर काम करना चाहिए। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यदि सेना राजनीतिक फैसलों में सक्रिय भूमिका निभाना चाहती है तो उसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहिए। मौलाना का यह बयान ऐसे समय आया है जब पाकिस्तान में सेना के प्रभाव और राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है। उनके बयान ने देश की राजनीतिक हलचल को और तेज कर दिया है।

 ‘राजनीति करनी है तो चुनाव लड़िए’

अपने भाषण के दौरान मौलाना फजलुर रहमान ने सेना प्रमुख को सीधे चुनौती देते हुए कहा कि यदि किसी को राजनीति करनी है तो उसे जनता के बीच जाकर चुनाव लड़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सत्ता का फैसला जनता करती है और यही किसी भी सरकार की असली ताकत होती है। मौलाना ने तंज भरे अंदाज में कहा कि अगर सेना राजनीतिक भूमिका निभाने की इच्छुक है तो उसे खुलकर मैदान में आना चाहिए और जनता का समर्थन हासिल करना चाहिए। उनके इस बयान को पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था पर एक बड़ा संदेश माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह टिप्पणी केवल एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है जिसमें सेना को अक्सर राजनीतिक घटनाक्रमों में प्रभावशाली भूमिका निभाने वाला माना जाता है।

बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा की स्थिति पर चिंता

मौलाना ने अपने संबोधन में पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि देश के कुछ हिस्सों में हालात लगातार चुनौतीपूर्ण होते जा रहे हैं। विशेष रूप से बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वहां सुरक्षा संबंधी समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं और आम नागरिकों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार और संबंधित संस्थाएं इन चुनौतियों का प्रभावी समाधान निकालने में सफल नहीं हो रही हैं। मौलाना ने कहा कि देश को स्थिरता और शांति की जरूरत है, लेकिन मौजूदा हालात लोगों की चिंता बढ़ा रहे हैं। उनके अनुसार, सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर गंभीर और दीर्घकालिक रणनीति की आवश्यकता है ताकि प्रभावित क्षेत्रों में सामान्य स्थिति बहाल की जा सके।

नागरिकों को हथियार उठाने की अपील पर भी जताई आपत्ति

अपने भाषण में मौलाना फजलुर रहमान ने उन बयानों पर भी असहमति जताई, जिनमें नागरिकों से आतंकवाद और सशस्त्र समूहों के खिलाफ लड़ाई में सहयोग की बात कही गई थी। उन्होंने कहा कि देश की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य और सुरक्षा एजेंसियों की जिम्मेदारी है। उनके अनुसार, आम लोगों को सीधे संघर्ष का हिस्सा बनने के लिए कहना उचित नहीं माना जा सकता। मौलाना ने जोर देकर कहा कि संसद, सरकार, न्यायपालिका और सेना सभी की अपनी-अपनी संवैधानिक सीमाएं और जिम्मेदारियां हैं। यदि हर संस्था अपने निर्धारित दायरे में काम करे तो लोकतांत्रिक व्यवस्था अधिक मजबूत हो सकती है। उनके इस बयान के बाद पाकिस्तान में सेना और राजनीतिक नेतृत्व के संबंधों को लेकर नई बहस शुरू हो गई है और आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर और प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं।

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