Bhavika Sharma: कहते हैं कि भक्ति और प्रतिभा किसी उम्र की मोहताज नहीं होती, इसे सच कर दिखाया है राजस्थान के नागौर जिले के बोरावड़ की रहने वाली नन्हीं भाविका शर्मा ने। जिस उम्र में बच्चे खिलौनों से खेलते हैं और ठीक से शब्दों का उच्चारण भी नहीं कर पाते, उस महज 2 साल 11 महीने की उम्र में भाविका की जुबां पर देवाधिदेव महादेव का सबसे कठिन ‘शिव तांडव स्तोत्र’ थिरक रहा है। रावण द्वारा रचित इस स्तोत्र के क्लिष्ट श्लोकों को भाविका जिस लय और शुद्धता के साथ पढ़ती है, उसे सुनकर अच्छे-अच्छे विद्वान भी दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। यह कोई सामान्य उपलब्धि नहीं है, बल्कि एक ऐसी रूहानी शक्ति का अहसास है, जिसने पूरे राजस्थान का नाम रोशन कर दिया है।
इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ नाम
भाविका की इस अलौकिक प्रतिभा को अब आधिकारिक तौर पर दुनिया ने भी मान लिया है। 13 अप्रैल 2023 को जन्मी इस लाडली ने 24 मार्च 2026 को एक ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया, जिसने उसे इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में जगह दिला दी। भाविका ने शिव तांडव स्तोत्र के 15 जटिल श्लोकों का पाठ मात्र 4 मिनट 20 सेकंड में पूरा कर दिखाया। जैसे ही रिकॉर्ड की घोषणा हुई, मकराना क्षेत्र सहित पूरे प्रदेश में जश्न का माहौल बन गया। लोग इसे साक्षात देवी का स्वरूप मान रहे हैं। तोतली आवाज में जब ‘जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले…’ जैसे मंत्र गूंजते हैं, तो सुनने वाला हर व्यक्ति मंत्रमुग्ध होकर ‘हर-हर महादेव’ जपने लगता है।
डॉक्टर मां और समर्पित पिता की अनोखी परवरिश
इस बड़ी उपलब्धि के पीछे भाविका के माता-पिता की तपस्या और परिवार के सात्विक वातावरण का बड़ा हाथ है। भाविका के पिता कपिल शर्मा अपनी बेटी की सफलता का सारा श्रेय अपने गुरुजनों और माता-पिता के आशीर्वाद को देते हैं। वहीं, उसकी मां डॉ. नेहा जोशी, जो पेशे से एक चिकित्सक हैं, उन्होंने यह साबित कर दिया कि विज्ञान और आध्यात्मिकता एक साथ चल सकते हैं। आज के डिजिटल युग में जहां अधिकतर बच्चे मोबाइल स्क्रीन और कार्टून की दुनिया में खोए रहते हैं, वहीं डॉ. नेहा और कपिल ने अपनी बेटी को सनातन संस्कृति और श्लोकों की घुट्टी पिलाई। घर के मंदिर से शुरू हुआ यह सफर आज राष्ट्रीय स्तर के रिकॉर्ड तक पहुंच गया है।
दादा-दादी की आंखों में खुशी के आंसू
भाविका की इस सफलता से उसके दादा श्रवण कुमार शर्मा और दादी संतोष शर्मा बेहद भावुक हैं। उनके अनुसार, यह सिर्फ एक रिकॉर्ड नहीं है, बल्कि उनकी पीढ़ियों के संस्कारों की जीत है। पूरे बोरावड़ गांव में आज भाविका को ‘लिटिल वंडर’ और ‘नन्हीं सरस्वती’ के नाम से पुकारा जा रहा है। भाविका की कहानी हमें सिखाती है कि अगर बचपन से ही बच्चों की जड़ों को संस्कारों के पानी से सींचा जाए, तो वे भविष्य में अपनी संस्कृति का परचम लहरा सकते हैं। राजस्थान की इस नन्हीं परी ने दिखा दिया है कि ईश्वर की भक्ति और एकाग्रता के बल पर ढाई साल की उम्र में भी इतिहास के पन्नों पर नाम लिखा जा सकता है।
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