UP: उत्तर प्रदेश की सियासत और सामाजिक ताने-बाने में पिछले कुछ वर्षों के भीतर एक बहुत बड़ा बदलाव दर्ज किया गया है। साल 2014 में देश के भीतर केंद्रीय नेतृत्व परिवर्तन और फिर साल 2017 में उत्तर प्रदेश की कमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हाथों में आने के बाद से राज्य की प्राथमिकताओं में आमूलचूल परिवर्तन देखने को मिले हैं। इस पूरे बदलाव की सबसे बड़ी धुरी सूबे की आधी आबादी यानी महिलाएं बनी हैं। आज उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों से लेकर मुख्य शहरों तक महिला सुरक्षा, उनके सम्मान, शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता को लेकर एक नया नैरेटिव तैयार हुआ है। सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच के तालमेल ने राज्य की लाखों महिलाओं के जीवन को सीधे तौर पर प्रभावित किया है। पहले जहां शाम ढलने के बाद बेटियों का घर से बाहर निकलना एक बड़ी चिंता का विषय माना जाता था, वहीं आज उनके हाथों को हुनर और पैरों को सुरक्षा का संबल देकर समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की बड़ी कोशिश की जा रही है।
अपराध के ग्राफ में आई इस बड़ी गिरावट के पीछे का असली सच
महिला सशक्तीकरण का सबसे पहला और अनिवार्य स्तंभ एक भयमुक्त और सुरक्षित वातावरण का होना है। बिना पुख्ता सुरक्षा के शिक्षा और स्वावलंबन के सारे दावे अधूरे रह जाते हैं। योगी सरकार ने इस बात को भांपते हुए सत्ता संभालते ही सुरक्षा तंत्र में कई बड़े फेरबदल किए। राज्य में एंटी रोमियो स्क्वॉड की तैनाती से लेकर महिला हेल्पलाइन 1090 को हाईटेक बनाने और हर थाने में एक समर्पित महिला हेल्प डेस्क स्थापित करने जैसे कदम उठाए गए। इन सबमें सबसे बड़ा नीतिगत बदलाव पुलिस भर्ती में महिलाओं को मिलने वाला 20 प्रतिशत का आरक्षण रहा। इसका सीधा असर यह हुआ कि साल 2017 तक जहां प्रदेश में महिला पुलिसकर्मियों की कुल संख्या महज 10 हजार के करीब सिमटी हुई थी, वह अब बढ़कर 44 हजार को पार कर गई है। इसी का परिणाम है कि आज नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आधिकारिक आंकड़ों में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है। आंकड़ों की मानें तो साल 2016 में जहां सूबे के भीतर दहेज उत्पीड़न और हत्या के मामलों की दर प्रति लाख पर 2.4 थी, वह घटकर 1.8 रह गई है। इतना ही नहीं, साल 2016 में महिलाओं के अपहरण के जो मामले 13,014 के डरावने स्तर पर थे, वे अब घटकर 7,919 पर आ चुके हैं, जबकि बलात्कार के मामलों की दर भी 4.6 से गिरकर 2.8 के स्तर पर आ चुकी है।
उज्ज्वला से लेकर कन्या सुमंगला तक
सुरक्षा के मोर्चे पर कड़े कदम उठाने के साथ-साथ सरकार ने महिलाओं के स्वास्थ्य और सामाजिक सम्मान को लेकर भी अपनी कल्याणकारी योजनाओं का दायरा बढ़ाया है। देश की सबसे बड़ी सामाजिक कल्याण योजनाओं में शुमार ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ का उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा लाभार्थी राज्य बनकर उभरा है। प्रदेश के लगभग 1.86 करोड़ गरीब परिवारों को मुफ्त एलपीजी गैस कनेक्शन देकर महिलाओं को उस पारंपरिक धुएं से मुक्ति दिलाई गई है जो उनके फेफड़ों और आंखों को समय से पहले बीमार कर देता था। इस एक कदम ने ग्रामीण महिलाओं के स्वास्थ्य सुधार के साथ-साथ उनके कीमती समय और दैनिक श्रम की भी भारी बचत की है। दूसरी ओर, बेटियों के जन्म को बोझ समझने वाली रूढ़िवादी सोच पर प्रहार करने के लिए ‘मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना’ की शुरुआत की गई। इस योजना के तहत बेटियों के जन्म से लेकर उनकी स्नातक स्तर की पढ़ाई तक विभिन्न चरणों में कुल 25,000 रुपये की आर्थिक सहायता सीधे उनके खातों में भेजी जा रही है। अब तक राज्य की 27.37 लाख से अधिक बेटियां इस योजना का प्रत्यक्ष लाभ उठाकर अपने सुनहरे भविष्य की इबारत लिख रही हैं, जिससे समाज में कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुरीतियों पर लगाम कसने में बड़ी मदद मिली है।
लखपति दीदी और स्वयं सहायता समूह
आर्थिक स्वतंत्रता ही किसी भी वर्ग की वास्तविक संप्रभुता का आधार होती है। उत्तर प्रदेश ने इस दिशा में ग्रामीण आजीविका मिशन के माध्यम से एक साइलेंट रेवोल्यूशन यानी मूक क्रांति की शुरुआत की है। वर्तमान में राज्य की करीब 1 करोड़ महिलाओं को छोटे-छोटे स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के नेटवर्क से जोड़ दिया गया है। इन समूहों ने न सिर्फ गांव की कम पढ़ी-लिखी महिलाओं को सीधे बैंकिंग प्रणाली और आसान ऋण व्यवस्था से रूबरू कराया, बल्कि उन्हें डेयरी उद्योग, कृषि प्रसंस्करण, सिलाई, कढ़ाई, हस्तशिल्प और स्थानीय खाद्य उत्पादों के निर्माण जैसे स्वरोजगारों से भी जोड़ा है। इसी कड़ी में केंद्र सरकार के ‘लखपति दीदी अभियान’ ने राज्य में नए पंख फैलाए हैं, जिसका मुख्य लक्ष्य स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं की सालाना आमदनी को कम से कम एक लाख रुपये से ऊपर ले जाना है। कौशल विकास और बेहतर मार्केट लिंकेज की बदौलत उत्तर प्रदेश में अब तक रिकॉर्ड 18.55 लाख महिलाएं ‘लखपति दीदी’ का गौरव हासिल कर चुकी हैं। यह आंकड़ा साफ तौर पर दर्शाता है कि उत्तर प्रदेश की नारी शक्ति अब केवल सरकारी मदद पर निर्भर रहने वाली लाभार्थी मात्र नहीं है, बल्कि वह खुद आत्मनिर्भर बनकर अपने परिवारों के आर्थिक फैसलों की मुख्य संचालक और नए रोजगार पैदा करने वाली एक बड़ी ताकत में तब्दील हो चुकी है।
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