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दरोगा की मौत का वो राज, जिसे पुलिस और कोर्ट ने बताया सुसाइड, पर परिवार के दावों ने उड़ा दिए सबके होश!

बस्ती के दरोगा अजय गौड़ की मौत मामले में कोर्ट का बड़ा फैसला। पत्नी की हत्या की अर्जी खारिज, न्यायालय ने माना खुदकुशी। एडीएम भाई अब खटखटाएंगे हाईकोर्ट का दरवाजा। जानिए पूरी इनसाइड स्टोरी।

बस्ती

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से कानून व्यवस्था और एक पुलिस अधिकारी की मौत से जुड़ी बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आई है। परशुरामपुर थाने के प्रभारी रहे दरोगा अजय गौड़ की रहस्यमयी मौत के मामले में स्थानीय अदालत ने अपना एक बड़ा और आखिरी फैसला सुना दिया है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) चौधरी संदीप सिंह की कोर्ट ने इस पूरी घटना को हत्या मानने से साफ इन्कार कर दिया है। अदालत के इस फैसले के बाद इस हाई-प्रोफाइल मामले में एक नया मोड़ आ गया है। जहाँ एक तरफ पुलिस और कोर्ट इसे आत्महत्या का रूप दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ दरोगा के परिवार वाले इस थ्योरी को मानने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं।

कोर्ट ने खारिज की पत्नी की अर्जी

इस पूरे मामले में नया मोड़ तब आया जब दरोगा अजय गौड़ की पत्नी रंजीता ने स्थानीय अदालत में एक अर्जी दाखिल की थी। इस अर्जी में उन्होंने अपने पति की मौत को सोची-समझी हत्या बताते हुए मुकदमा दर्ज करने की मांग की थी। हालांकि, सीजेएम कोर्ट ने पुलिस द्वारा पेश किए गए डिजिटल, भौतिक और वैज्ञानिक सबूतों को देखने के बाद पत्नी की इस याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया। कोर्ट ने भी पुलिस की उस जांच को सही माना, जिसमें कहा गया था कि दरोगा ने नदी में कूदकर खुदकुशी की थी। लेकिन कोर्ट के इस फैसले के तुरंत बाद दरोगा के छोटे भाई, जो झाँसी में एडीएम (अरुण कुमार) के पद पर तैनात हैं, उन्होंने साफ कर दिया है कि वे इंसाफ के लिए अब देश की बड़ी अदालत यानी हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे।

‘गलत थाना मिल गया है’— गायब होने से पहले दरोगा की वो आखिरी कॉल

दरोगा की पत्नी रंजीता के दावों में कुछ ऐसे सवाल हैं जो इस पूरी कहानी को उलझा देते हैं। रंजीता के मुताबिक, 5 फरवरी को जब उनके पति परशुरामपुर थाने से अचानक गायब हुए, तब उनके पास थाने का चार्ज था। गायब होने से दो दिन पहले 3 फरवरी को अजय गौड़ ने अपनी पत्नी से फोन पर कहा था कि “उन्हें गलत थाना मिल गया है।” इसके बाद 5 फरवरी को दोपहर 3 बजे जब पत्नी ने फोन किया, तो दरोगा ने ‘बाद में बात करता हूँ’ कहकर फोन काट दिया और रात होते-होते उनका फोन बंद हो गया। अगले दिन सुबह 9 बजे जब पत्नी ने थाने के सिपाही को फोन किया, तब जाकर उन्हें पता चला कि दरोगा साहब तो गायब हैं। बाद में उनकी बाइक अमहट घाट के पास से मिली, और गायब होने के चार दिन बाद 9 फरवरी को उनकी लाश सीतारामपुर माझा के पास सरयू नदी से बरामद हुई।

परिवार ने उठाए ये गंभीर सवाल

इस मामले में सबसे बड़ा सस्पेंस तब खड़ा हुआ जब थाने के सीसीटीवी फुटेज में देखा गया कि दरोगा के साथ बाइक पर पीछे पंकज नाम का एक कर्मचारी बैठा हुआ था। दरोगा की पत्नी का आरोप है कि उनके पति को लगातार धमकियां मिल रही थीं। जब वे लोग थाने पहुँचे और पंकज से पूछताछ की, तो वह बुरी तरह घबराने लगा। इतना ही नहीं, पंकज के मोबाइल फोन से उस दिन की कॉल डिटेल भी गायब यानी डिलीट थी, जिसका वह कोई सही जवाब नहीं दे पाया। परिवार का कहना है कि पुलिस ने इन सभी अहम कड़ियों को नजरअंदाज करके सिर्फ वैज्ञानिक सबूतों के दम पर मामले का पटाक्षेप कर दिया। अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि जब यह मामला हाईकोर्ट पहुँचेगा, तो क्या इस मौत के पीछे का असली सच बाहर आ पाएगा?

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