महिला सुरक्षा और यौन उत्पीड़न के गंभीर मामलों में अदालतों की संवेदनशीलता को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। हाल ही में पटना हाईकोर्ट द्वारा दिए गए एक विवादित फैसले ने देश की सबसे बड़ी अदालत को सख्त रुख अपनाने पर मजबूर कर दिया है। पटना हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा था कि किसी महिला की सलवार उतारना या उसकी छाती दबाना बलात्कार के प्रयास (Attempt to Rape) की श्रेणी में नहीं आता, बल्कि यह केवल महिला की मर्यादा भंग करने का मामला है। इस टिप्पणी और फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी नाराजगी व्यक्त की है और न्यायपालिका में जजों को अधिक संवेदनशील बनाने के लिए कड़े कदम उठाने के निर्देश दिए हैं।
इलाहाबाद से पटना तक: विवादित फैसलों का वो सिलसिला जिसने हिला दिया
यह पहला मौका नहीं है जब किसी उच्च न्यायालय ने इस तरह की टिप्पणी की हो। इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले पर भी सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था, जिसमें पजामे का नाड़ा खींचने और शारीरिक छेड़छाड़ को रेप की कोशिश मानने से इनकार कर दिया गया था। शीर्ष अदालत में सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने ध्यान दिलाया कि ऐसे फैसले बार-बार सामने आ रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और पीठ के अन्य जजों ने इस बात पर चिंता जताई कि निचली अदालतों के न्यायाधीश ऐसे मामलों में जरूरी कानूनी शोध और संवेदनशीलता का परिचय नहीं दे रहे हैं, जो कि न्याय व्यवस्था की साख पर सवाल उठाता है।
2008 का वो खौफनाक मामला, जिस पर हाईकोर्ट ने बदला फैसला
जिस मामले पर यह पूरा विवाद खड़ा हुआ, उसकी शुरुआत साल 2008 में हुई थी। एक युवती अपने पिता के साथ फोटोग्राफी स्टूडियो गई थी, जहां आरोपी ने दरवाजा अंदर से बंद करके उसके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की। युवती की चीख सुनकर जब पिता आए तो आरोपी फरार हो गया। निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने सबूतों के आधार पर आरोपी को बलात्कार के प्रयास का दोषी ठहराया था। लेकिन मामला जब पटना हाईकोर्ट पहुंचा, तो मेडिकल रिपोर्ट की कमी और जांच अधिकारी के बयान दर्ज न होने का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने रेप के प्रयास की धारा को रद्द कर दिया और इसे धारा 354 के तहत महज छेड़छाड़ का मामला करार देकर सजा घटा दी।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश
पटना हाईकोर्ट के इस रुख पर कड़ा रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (National Judicial Academy) की उस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने का निर्देश दिया है, जो यौन अपराधों में संवेदनशीलता पर आधारित है। सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया है कि इस राष्ट्रीय गाइडबुक/हैंडबुक को सुप्रीम कोर्ट और देश के सभी हाईकोर्ट्स की वेबसाइटों पर अपलोड किया जाए। साथ ही, सभी राज्य सरकारों और पुलिस प्रशासन को यह कड़ा निर्देश दिया गया है कि एफआईआर दर्ज करने से लेकर चार्जशीट दाखिल करने तक, पुलिस अधिकारी इस हैंडबुक के नियमों का सख्ती से पालन करें ताकि पीड़ितों को शुरुआत से ही सही न्याय मिल सके।
